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A poem on morning in Hindi ​

Answer» TION:सुबह की धूप / कौशल किशोरहम पड़े रहते हैंनींद की चादर के नीचेसुविधाओं को तह किएऔर बाहरसुबह की धूप हमारा इंतज़ार करती हैखिड़की-रोशनदानों पर दस्तक देती हुईसब कुछ जानते-समझते हुए भीहम बेख़बर रहते हैंसुबह की इस धूप सेजो हर सुराख से पहुँच रहीअपनी चमकीली किरणों के साथअंधकार को भेदती हुईयह उतरती हैपहाड़ की सबसे ऊँची चोटी परफिसलती हुईघास पर पड़ी ओस की बूँदों मेंमेतियों की तरह चमकती हैपेड़ की फुनगियों से झूला झूलती हैनहाती है समुद्र की लहरों मेंचिड़ियों की तरह चहचहाती हैस्कूल के बच्चों की तरहघर से बाहर निकलती हैकितनी नटखट है यह धूपसुबह-ही-सुबहहमारी नींदहमारी दुनिया में हस्तक्षेप करती हैडायरी की तरह खोल देती हैएक पूरा सफ़ेद दिनइसी तरह जगाती हैहम-जैसे सोये आदमी कोउसे ज़िन्दगी की मुहिम मेंशामिल करती है हर रोज़ ।HOPE IT HELPS YOU!!!


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