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आर्थिक और अनार्थिक प्रवृत्ति को उदाहरण सहित समझाइए ।

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मनुष्य सतत प्रवृत्तिशील है । वह दिनभर अनेक प्रकार की प्रवृत्तियाँ करता हैं । अर्थशास्त्र मनुष्य की सभी प्रवृत्तियों का अध्ययन नहीं करता हैं, मात्र आर्थिक प्रवृत्तियों का अध्ययन करता है । इसलिए अर्थशास्त्र के अध्ययन में आर्थिक प्रवृत्ति का अर्थ समझना आवश्यक है ।’

(1) आर्थिक प्रवृत्ति : ‘मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के उद्देश्य से वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय के लिए आय प्राप्त करना और खर्च करने की प्रवृत्ति करता है उसे आर्थिक प्रवृत्ति कहते हैं ।’

आर्थिक प्रवृत्ति में तीन बातें महत्त्वपूर्ण हैं : आय, खर्च और विनिमय अर्थात आर्थिक विनिमय के लिए आय-प्राप्ति या खर्च करने की प्रवृत्ति अर्थात् आर्थिक प्रवृत्ति । संक्षिप्त में ‘आवश्यकता, संतुष्टि, अर्थ उपार्जन के लिए मनुष्य के द्वारा की गई प्रवृत्ति को आर्थिक प्रवृत्ति कहते हैं ।

इस प्रकार आर्थिक प्रवृत्ति में कुछ प्राप्त करने के लिए खर्च करना पड़ता है । इसमें विनिमय होना जरूरी है । जिसे नीचे के उदाहरणों से समझ सकते हैं :

  1. होटल में खाना खाना (खर्च करके आवश्यकता संतुष्ट करना)
  2. थियेटर में जाकर फिल्म देखना (खर्च करके मनोरंजन प्राप्त करना)
  3. खेत में जाकर परिश्रम करना (श्रम करके उत्पादन प्राप्त करना)
  4. स्कूल में बच्चों को पढ़ाकर वेतन प्राप्त करना (सेवा देकर आय प्राप्त करना)

(2) अनार्थिक प्रवृत्ति : जिस प्रवृत्ति का उद्देश्य आय प्राप्त करना, खर्च करना और विनिमय नहीं है इनको छोड़कर सभी प्रवृत्ति अनार्थिक प्रवृत्ति हैं ।
जैसे : दया, प्रेम, माया जैसी भावना से प्रेरित प्रवृत्तियाँ अनार्थिक प्रवृत्तियाँ हैं ।
जिस प्रवृत्ति में मात्र आय या मात्र खर्च हो और विनिमय न हो वह प्रवृत्ति अनार्थिक है । जिसे नीचे के उदाहरण से समझ सकते हैं

  1. दान देने की प्रवृत्ति (खर्च करने पर भी सामने से प्रत्यक्ष कुछ नहीं मिलता है ।)
  2. गृहिणी का घर में खाना पकाना (श्रम के बदले आय प्राप्त नहीं होती है ।)
  3. चोरी करके आय प्राप्त करना (बिना खर्च के आय प्राप्त करना)
  4. खुद के बच्चों को पढ़ाना (सेवा के बदले आय प्राप्त नहीं हुयी)


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