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आशय स्पष्ट कीजिए –इस प्रकार कवि की मर्मभेदी दृष्टि ने इस भाषाहीन प्राणी की करुण दृष्टि के भीतर उस विशाल मानव-सत्य को देखा है, जो मनुष्य, मनुष्य के अंदर भी नहीं देख पाता।

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अन्यों की तुलना में कवि अधिक संवेदनशील होता है। गुरुदेव ने यह जान लिया था कि कुत्ते के पीठ पर मात्र उनके स्पर्श से ही वह आनंदित हो उठता है, ठीक उसी प्रकार लंगड़ी मैना के भावों को देखकर गुरुदेव ने उसके भीतर के मर्म को पहचान लिया था। जो लेखक को बिलकुल भी पता नहीं था। मूक प्राणियों में भी मनुष्य के जैसी संवेदनाएँ होती हैं यह वही पहचान सकता है जिसकी मर्मभेदी दृष्टि हो।

गुरुदेव हर भाषाहीन प्राणी के मर्म को पहचान लेते थे, चाहे वह कुत्ता हो या मैना या फूल पत्ति। आज मनुष्य अत्यंत संवेदनहीन हो गया है जो मनुष्य को देखकर उनके दुःखों का पता नहीं लगा पाता। किन्तु गुरुदेव यानी कवि की मर्मभेदी दृष्टि भाषाहीन प्राणी की करुण दृष्टि को पहचान लेती है।



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