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अच्छा मेरी जरसी पहन लो।’ लहनासिंह ने बोधासिंह को अपनी जरसी क्यों दी और क्या कहकर सन्तुष्ट किया?

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बोधासिंह को कैंपकपी सी छूट रही थी । दाँत बज रहे थे। इसीलिए लहनासिंह ने उपर्युक्त कथन कहते हुए बोधासिंह को अपनी जरसी दी और यह कहकर संतुष्ट किया कि “मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है। मेरे पास दूसरी जरसी है जो विलायत से मेम ने बुनकर भेजी है।”



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