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अधिकार से क्या तात्पर्य है? लोकतन्त्र में उपलब्ध नागरिकों के अधिकारों का वर्णन कीजिए।याअधिकारों का वर्गीकरण कीजिए।याअधिकारों के विभिन्न प्रकार बताइए और सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। याकिन्हीं चार राजनीतिक अधिकारों का वर्णन कीजिए।

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प्रजातान्त्रिक राज्यों में अधिकार को मानव-जीवन का आधार माना जाता है, क्योंकि व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन का विकास अधिकारों पर ही निर्भर करता है। सामान्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि “अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत तथा राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त व्यक्ति को दी जाने वाली वे सुविधाएँ हैं जो उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक होती हैं।

अधिकार की परिभाषा
विभिन्न विचारकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के आधार पर अधिकार की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं-
⦁    लॉस्की के अनुसार, “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना सामान्यतः कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता।”
⦁    वाइल्ड के अनुसार, “अधिकार कुछ विशेष कार्यों को करने की स्वाधीनता की उचित माँग है।”
⦁    बोसांके के शब्दों में, “अधिकार वे माँग हैं जिन्हें समाज स्वीकार तथा राज्य लागू करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर अधिकार के निम्नलिखित तत्त्व अथवा लक्षण स्पष्ट होते हैं-
⦁    व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक सुविधाएँ,
⦁    समाज की स्वीकृति,
⦁    राज्य द्वारा मान्यता एवं संरक्षण,
⦁    सार्वभौमिकता तथा
⦁    लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित।

अधिकारों का वर्गीकरण
अधिकार सामान्य रूप में दो प्रकार के होते हैं-
⦁    नैतिक अधिकार तथा
⦁    कानूनी या वैधानिक अधिकार।

1. नैतिक अधिकार
नैतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं जिनका सम्बन्ध मनुष्य के नैतिक आचरण से होता है। उनके पीछे राज्य की कानूनी शक्ति नहीं होती है। अतएव इनको मानना या न मानना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। इन्हें प्राप्त करने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता। इन अधिकारों में शिष्ट व्यवहार, नैतिक मान्यताएँ और चारित्रिक नियम सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नैतिक अधिकारों का राज्य अथवा कानून से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। उदाहरण के लिए, वृद्ध और असहाय माता-पिता अपनी सन्तान से जीवन-यापन के लिए सहायता पाने के नैतिक रूप से अधिकारी हैं, परन्तु यदि सन्तान उनकी सहायता नहीं करती तो वह दण्ड की भागी नहीं हो सकती।
2. कानूनी या वैधानिक अधिकार
कानूनी अधिकार वे अधिकार हैं जिनकी व्यवस्था राज्य द्वारा कानून के अनुसार की जाती है। इन अधिकारों में बाधा डालने वाले दण्ड के भागी होते हैं।
कानूनी या वैधानिक अधिकार दो प्रकार के होते हैं-
(क) सामाजिक अधिकार तथा (ख) राजनीतिक अधिकार।

(क) सामाजिक अधिकार – सामाजिक अधिकार वे अधिकार हैं जो मानवीय आधार पर प्रायः राज्य के नागरिक तथा विदेशी सभी को प्राप्त होते हैं। प्रमुख सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं-
⦁    जीवन का अधिकार – प्रत्येक व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्राप्त होता है। यह अधिकार मनुष्य के अस्तित्व से सम्बन्धित होता है। जीवन के अधिकार में यह बात भी उल्लेखनीय है कि कोई व्यक्ति स्वयं अपना जीवन समाप्त नहीं कर सकता। आत्महत्या करना दण्डनीय अपराध है।
⦁    धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार – इस अधिकार का अर्थ है कि मनुष्य को किसी भी धर्म को मानने व उसका प्रचार करने का अधिकार है। राज्य द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके ऊपर कोई धर्म थोपा नहीं जा सकता।
⦁    शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार – शिक्षा राष्ट्रीय जीवन की आधारशिला है। व्यक्ति के व्यक्तित्व, समाज और राष्ट्र का विकास सब कुछ शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अभाव में कोई भी मनुष्य उत्तम नागरिक नहीं बन सकता। अरस्तू का तो यह कहना था कि “नागरिक बनने के लिए शिक्षित होना अनिवार्य है। आज के लोकतन्त्रात्मक युग में तो यह अधिकार अत्यन्त अनिवार्य है। संस्कृति के अधिकार का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी भाषा, लिपि, साहित्य, कला एवं परम्पराओं को अपनाने तथा उन्हें सुरक्षित रखने की सुविधा प्राप्त होनी चाहिए।
⦁    सम्पत्ति का अधिकार – सम्पत्ति के अधिकार का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन-यापन के लिए वैध उपायों द्वारा धन अर्जित करने, एकंत्रं करने एवं खर्च करने का अधिकार होना चाहिए। उसके इस अधिकार में किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होता। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि राज्य सार्वजनिक हित के लिए क्षतिपूर्ति देकर किसी व्यक्ति की सम्पत्ति का अधिग्रहण कर सकता है। साम्यवादी राज्य इस अधिकार के विरुद्ध हैं।
⦁    विचार व्यक्त करने का अधिकार – प्रत्येक व्यक्ति को लेखन, भाषण आदि के द्वारा अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए। परन्तु व्यक्ति को अपने विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार उसी सीमा तक होना चाहिए जहाँ तक कि उससे सामाजिक अहित न होता हो। लोकतन्त्र में इस अधिकार का बहुत अधिक महत्त्व है।
⦁    समुदाय बनाने का अधिकार – इस अधिकार के अन्तर्गत व्यक्ति को समुदाय बनाने और उसका सदस्य बनाने का अधिकार दिया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दलों, विविध प्रकार के समुदाय इसी अधिकार के आधार पर जन्म लेते हैं।
⦁    परिवार का अधिकार – परिवार सामाजिक जीवन की प्रथम इकाई तथा नागरिकता का प्रथम विद्यालय है। इस अधिकार के अन्तर्गत विवाह करने, यौन–सम्बन्धों की शुद्धता बनाये रखने, सन्तान व माता-पिता के पारस्परिक सम्बन्ध, उत्तराधिकार आदि के अधिकार सम्मिलित हैं। प्रत्येक व्यक्ति का यह अधिकार है कि वह बिना किसी हस्तक्षेप या प्रतिबन्ध के अपने पारिवारिक जीवन का सुख भोग सके।
⦁    न्याय का अधिकार – न्याय के अधिकार से आशय यह है कि न्यायालयों में धनी, निर्धन, साधारण नागरिक और उच्च अधिकारी में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए। कानून के सामने छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं होना चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है जब देश में विधि-विहित शासन हो।
⦁    रोजगार का अधिकार – प्रत्येक नागरिक को राज्य की ओर से उसकी योग्यता और शक्ति के अनुसार काम दिया जाए और उसे उसके परिश्रम के अनुरूप वेतन मिले। समाजवादी देशों में इस अधिकार का विशेष महत्त्व है।
इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के कोई भी वैध व्यवसाय करने तथा योग्यतानुसार सरकारी नौकरी प्राप्त करने का अधिकार होता है।
⦁    समानता का अधिकार – इस अधिकार के अन्तर्गत राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समानता के अधिकार प्रमुख हैं। ये लोकतन्त्र के प्राण हैं। इनके अभाव में लोकतन्त्र की कल्पना ही अधूरी रह जाती है।

(ख) राजनीतिक अधिकार – राजनीतिक अधिकार नागरिक को देश के शासन में भाग लेने का अवसर प्रदान करते हैं। ये निम्नलिखित हैं-
⦁    मतदान का अधिकार – लोकतन्त्र में यह अधिकार राज्य के समस्त वयस्क नागरिकों को प्रतिनिधि संस्थाओं के लिए सदस्यों को चुनने का अधिकार देता है। नागरिकों का यह अधिकार देश के भाग्य का निर्णय करता है।
⦁    चुनाव लड़ने का अधिकार – मतदान के साथ ही लोकतन्त्र में प्रत्येक नागरिक को यह भी अधिकार होता है कि वह स्वयं भी प्रतिनिधि संस्थाओं की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ सके। किसी व्यक्ति को रंग, जाति, लिंग अथवा सम्पत्ति के आधार पर इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।
⦁    सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार – इस अधिकार के अन्तर्गत सभी नागरिकों को योग्यता के अनुरूप सरकारी पदों पर नियुक्त होने का अधिकार प्राप्त रहता है। कोई भी नागरिक धर्म, जाति, लिंग अथवा सम्पत्ति के आधार पर सरकारी पद पाने से वंचित नहीं होना चाहिए।
⦁    सरकार की आलोचना करने का अधिकार – सभी लोकतान्त्रिक राज्यों के नागरिकों को सरकार की दोषपूर्ण नीतियों की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त होता है। यदि लोग सरकार के कार्यों व नीतियों से सन्तुष्ट नहीं हैं तो वे उसकी खुलकर आलोचना कर सकते हैं, परन्तु सरकार का विरोध शान्तिपूर्ण ढंग से एक संवैधानिक प्रक्रिया के द्वारा ही किया जा सकता है।
⦁    आवेदन-पत्र देने का अधिकार – प्रायः प्रत्येक सभ्य एवं लोकतन्त्रात्मक राज्य में नागरिकों को आवेदन-पत्र देने का अधिकार प्राप्त होता है। इस आवेदन-पत्र के द्वारा लोग सरकार का ध्यान अपने कष्टों की ओर आकृष्ट करते हैं। यह अधिकार सरकार पर अंकुश रखता है और इसके कारण सरकार जनता के कष्टों की उपेक्षा नहीं कर सकती।



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