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अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त पर टिप्पणी लिखिए।

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इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार राज्य की इच्छा के परिणाम हैं और राज्य ही अधिकारों का स्रोत है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के एकदम विपरीत है। इस सिद्धान्त को मानने वालों में बेन्थम, हॉलैण्ड, ऑस्टिन आदि विद्वान् हैं। इन विद्वानों के अनुसार व्यक्ति राज्य के संरक्षण में रहकर भी अधिकारों का प्रयोग करता है और राज्य ही अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है।

इस सिद्धान्त में निम्नलिखित दोष पाये जाते हैं-
⦁    यह सिद्धान्त राज्य की निरंकुशता का समर्थक है।
⦁    राज्य नैतिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
⦁    अधिकारों में स्थायित्व नहीं रहता है।



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