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अधिकारों से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए। |
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Answer» अधिकार सम्बन्धी विभिन्न सिद्धान्त आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं- 2. अधिकारों का कानूनी या वैधानिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के प्रवर्तक बेन्थम, हॉलैण्ड, आँ स्टिन आदि विचारक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, अधिकार राज्य की इच्छा के परिणाम हैं और राज्य ही अधिकारों का जन्मदाता है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के विपरीत है। व्यक्ति राज्य के संरक्षण में रहकर ही अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। राज्य ही कानून द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करता है, जहाँ व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग कर सके। राज्य ही अधिकारों को वैधता प्रदान करता है। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अधिकारों का अस्तित्व केवल राज्य के अन्तर्गत ही सम्भव है। आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं- 3. अधिकारों का ऐतिहासिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों की उत्पत्ति प्राचीन रीति-रिवाजों के परिणामस्वरूप होती है। जिन रीति-रिवाजों को समाज स्वीकृति दे देता है, वे अधिकार का रूप धारण कर लेते हैं। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार, अधिकार परम्परागते हैं तथा सतत विकास के परिणाम हैं। इसके अतिरिक्त इनका आधार ऐतिहासिक है। इंग्लैण्ड के संवैधानिक इतिहास में परम्परागत अधिकारों को बहुत अधिक महत्त्व रहा है। आलोचना- इस सिद्धान्त के आलोचकों का मत है कि अधिकारों का आधार केवल रीतिरिवाज तथा परम्पराएँ नहीं हो सकतीं, क्योंकि कुछ परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज समाज के कल्याण में बाधक होते हैं। अतः इस दृष्टि से यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है। 4. अधिकारों का समाज – कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त-जे०एस० मिल, जेरमी बेन्थम, पाउण्ड, लॉस्की आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। इस सिद्धान्त का प्रमुख लक्ष्य उपयोगिता या समाज-कल्याण है। प्रो० लॉस्की के अनुसार-“अधिकारों का औचित्य उनकी उपयोगिता के आधार पर ऑकना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार वे साधन हैं, जिनसे समाज का कल्याण होता है। लॉस्की का मत है-“लोक-कल्याण के विरुद्ध मेरे अधिकार नहीं हो सकते क्योंकि ऐसा करना मुझे उस कल्याण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है जिसमें मेरा कल्याण घनिष्ठ तथा अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।” आलोचना- यह सिद्धान्त तर्कसंगत और उपयोगी तो है, किन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि यह सिद्धान्त समाज-कल्याण की ओट में राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता का हनन करने का अवसर प्रदान करता है, लेकिन समीक्षात्मक दृष्टि से यह दोष महत्त्वहीन है। 5. अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त – इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार वे बाह्य साधन तथा दशाएँ हैं, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होती हैं। इस सिद्धान्त का समर्थन थॉमस हिल ग्रीन, हीगल, बैडले, बोसांके आदि विचारकों ने किया है। आलोचना- इस सिद्धान्त के कतिपय दोष निम्नलिखित हैं- निष्कर्ष- अधिकारों के उपर्युक्त सिद्धान्तों के अध्ययन के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त ही सर्वोपयुक्त है क्योंकि यह इस अवधारणा पर आधारित है कि अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए है। राज्य तथा समाज तो केवल व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा तथा व्यवस्था करने के साधन मात्र हैं। व्यक्ति समाज के कल्याण में ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। |
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