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Akhand Bharat par essay

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अगस्त है। हम सब 'अखण्ड भारत दिवस' मना रहे है। अखण्ड भारत को लेकर अनेक जगह संगोष्ठी, निबंध प्रतियोगिता एवं व्याख्यानमालाएं आयोजित की जा रही है, पर्चे बांटे जा रहे है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि कुछ लोगों को छोड़कर आज लोग अखण्ड भारत का विचार ही नहीं करते। इसका कारण यह है कि भारत विभाजन को स्थापित सत्य मान लिया गया है। लोग कहते है कि भारत का विभाजन एकदम गलत है, यह नहीं होना चाहिए था, परन्तु अब क्या किया जा सकता है, विभाजन तो हो गया। अब फिर से भारत को अखण्ड थोड़े ही किया जा सकता है। इसी विचार के कारण लोग विभाजन और अखण्ड भारत के बारे में सोचते ही नहीं। इसीलिए सब से पहले लोगों के मनों से स्थापित सत्य वाली बात को निकालना होगा। आइए, इतिहास की कुछ स्थापित सत्य दिखनेवाली बातों के बारे में विचार किया जाए। हम अखण्ड भारत विषय पर विस्तार से चर्चा करना चाहते है। डॉ। सदानन्द दामोदर सप्रे ने अखण्ड भारत मुद्दे पर विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है। प्रथम कडी में, इस पुस्तक में प्रस्तुत प्रमुख बिन्दुओं को हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं-· जिस तरह स्वाधीनता से पहले प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए स्वाधीनता की भावना प्रेरणा का मुख्य स्रोत हुआ करती थी उसी तरह स्वाधीनता के बाद अखण्ड भारत का स्वप्न प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए प्रेरणा का मुख्य स्रोत होना चाहिए और इस स्वप्न को साकार करने के लिये उसको सतत् क्रियाशील रहना चाहिए।· विभाजन का मूल कारण है राष्ट्र और संस्कृति के बारे में भ्रामक धारणा। अंग्रेजों के जाल में हमारा नेतृत्व फंसा। तबसे राष्ट्र और संस्कृति के विषय में सर्वसामान्य जनता की भी धारणा भ्रामक हो गई। मिला-जुला राष्ट्र और मिली-जुली संस्कृति के विचार के कारण एक राष्ट्र, एक संस्कृति की बात गलत लगने लगी।· स्वाधीनता संग्राम के एक प्रमुख नेता पं. जवाहरलाल नेहरू कहा करते थे कि "We are a nation in the making" अर्थात् ''हम राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है''। अंग्रेजों ने यह संभ्रम फैलाने का प्रयास किया कि भारत कभी एक राष्ट्र रहा ही नहीं, उन्होंने इसे एक राष्ट्र बनाया है।· अंग्रेजों की शह से पुष्ट हुई मुस्लिम लीग ने 1940 में देश के विभाजन की मांग की, अंग्रेजों ने 3 जून 1947 को विभाजन की योजना प्रस्तुत की और 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को देश का विभाजन हो गया।विभाजन के बीज:· 1906 में की गई पृथक निर्वाचक-मण्डल की मांग को भारत विभाजन की दिशा का पहला कदम कहा जा सकता है। यह स्पष्ट रूप से मुस्लिम अलगाववाद था और इसे अंग्रेजों का समर्थन प्राप्त था।· 1906 में अड़तालीसवें शिया इमाम आगा खां के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल लार्ड मिण्टो से मिला। इसकी प्रमुख मांग थी- मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचक मण्डल। लार्ड मिण्टो ने इस मांग के प्रति अपनी सहमति जाहिर की और आगे चलकर 1909 के मार्ले-मिण्टो सुधारों में इसे सम्मिलित किया।· तुष्टीकरण के अंतर्गत शर्तों के आधार पर मुसलमानों को स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित करने के लिए कांग्रेस ने राष्ट्रीय मानबिन्दुओं के साथ समझौते किए। 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में प्रख्यात गायक पं. पलुस्कर ने जैसे ही 'वन्देमातरम्' का गायन प्रारंभ किया वैसे ही कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली ने यह कहते हुए गायन को रोकने का प्रयास किया कि इसमें मूर्ति पूजा है इसलिए इससे मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। मंच पर आसीन एक भी नेता ने इसका विरोध नहीं किया। पं. पलुस्कर ने मोहम्मद अली को यह कहकर चुप कर दिया कि मुझे यहां 'वन्देमातरम्' गाने के लिए बुलाया गया है और मैं तो गाऊंगा। इसके बाद उन्होंने संपूर्ण 'वन्देमातरम्' गाया और उस दौरान मोहम्मद अली मंच से उठकर चले गये। आगे चलकर 1937 में यह देखने के लिए एक समिति बनाई गई कि 'वन्देमातरम्' का कौन सा हिस्सा मुसलमानों के लिए आपत्तिजनक है। उनके निष्कर्ष के अनुसार ' वन्देमातरम्' के केवल पहले दो पद ही गाये जायेंगे ऐसा तय हुआ और आगे का 'वन्देमातरम्' निकाल दिया गया। आज भी हमारे स्वीकृत राष्ट्रगीत 'वन्देमातरम्' में पहले दो पद ही हैं, संपूर्ण 'वन्देमातरम्' नहीं है।· मोहम्मद अली जिन्ना की अध्यक्षता में 1927 में प्रमुख मुस्लिम नेताओं की एक बैठक हुई। इसमें उनकी मांगें ''चार सूत्र'' के रूप में प्रस्तुत की गई इस समय तक पृथक निर्वाचन-मंडल वाली बात निष्प्रभावी हो चुकी थी, अत: चार सूत्रों के बदले पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर आरक्षण वाले संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की बात स्वीकार करने की बात कही गई-(1) सिंध का मुंबई प्रांत से अलग किया जाये(2) पश्चिमोत्तार सीमा प्रांत और ब्लूचिस्तान का स्तर बढ़ाकर उन्हें पूर्ण गवर्नर का प्रांत बनाया जाये।(3) पंजाब और बंगाल इन मुस्लिम बहुल प्रांतों में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाये।(4) केन्द्रीय विधानमंडल में कम से कम एक तिहाई सदस्य मुसलमान हों।सभी मांगें खतरनाक थीं। विशेष रूप से सिंध को मुंबई से अलग करने की। क्योंकि इससे सिंध मुस्लिम बहुल प्रांत बननेवाला था। (सिंध के मुस्लिम बहुत प्रांत बनने से ही विभाजन के समय वह पाकिस्तान में शामिल हो गया, जबकि यदि वह हिन्दू-बहुल मुंबई प्रांत का हिस्सा होता तो सिंध आज भारत में होता।) कांग्रेस ने पहली तीन मांगें स्वीकार कर लीं। जब जिन्ना ने देखा कि कांग्रेस इतना झुक रही है तो उसने 1928 में ''जिन्ना के चौदह सूत्र' प्रस्तुत कर दिए। इनमें पिछली सारी मांगें तो थी हीं, साथ में कुछ और मांगें भी थीं, जिनमें प्रमुख थी-(1) पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तार सीमाप्रांत का कोई ऐसा पुनर्गठन न हो जिससे उनका मुस्लिम बाहुल्य समाप्त हो।(2) केन्द्रीय और सभी प्रांतीय मंत्रिकंडलों में कम से कम एक तिहाई मुस्लिम हों।



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