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“अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगायें।” लेखक का आशय स्पष्ट कीजिए।

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अमृतसर के बम्बूकार्ट वाले भीड़ भरे बाजार में सब्र के साथ मीठी कर्ण प्रिय भाषा में सामने वालों को हटाते हुए निकलते हैं। वे लोगों को हटाते हुए हमेशा ‘जी’ और ‘साहब’ शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनकी जीभ महीन मार करती हुई मीठी छुरी की तरह चलती है। जब बार-बार हटाने पर भी लोग नहीं हटते तो उनकी बोली सुनने को मिलती है-हट जा जीणे जोगिए, हट जा करमाँवालिए, हट जा पुत्ताँ प्यारिए। बच जा लम्बी उमाँ वालिए । अमृतसर के गाड़ी वालों की जबान कड़वी थी जिसे सुनकर सभी को बुरा लगता था। पर इनकी वाणी में वह कटुता नहीं थी। केवल स्त्रियों के लिए ही नहीं, पुरुषों के लिए भी यही मिठास भरी थी।



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