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अन्तर्राष्ट्रीयता से आप क्या समझते हैं? इसके विकास और सफलताओं पर प्रकाश डालिए।याअन्तर्राष्ट्रीयता का क्या तात्पर्य है? अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना विकसित करना क्यों आवश्यक है? दो कारण लिखिए तथा उदाहरण देकर समझाइए।याअन्तर्राष्ट्रीयता से आप क्या समझते हैं? इसके विकास के मार्ग की प्रमुख बाधाओं का उल्लेख कीजिए। याअन्तर्राष्ट्रीयता से आप क्या समझते हैं? इसके मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं का उल्लेख कीजिए। याअन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बाधक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।याअन्तर्राष्ट्रीयता के विकास के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं की चर्चा कीजिए। 

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अन्तर्राष्ट्रीयता
अन्तर्राष्ट्रीयता विश्व-बन्धुत्व या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का राजनीतिक रूप है। इस भावना का आधार मनुष्य-मात्र की समानता या भ्रातृभाव है। इस सम्बन्ध में प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    गोल्डस्मिथ के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीयता एक भावना है जिसके अनुसार व्यक्ति केवल अपने राज्य का ही सदस्य नहीं, वरन् समस्त विश्व का नागरिक है।”
⦁    जॉन वाटसन के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रवाद विचारों व कार्यों की वह पद्धति है, जिसका उद्देश्य विश्व के राज्यों में शान्तिपूर्ण सहयोग का विकास करना है।”
⦁    लॉयड गैरीसन के शब्दों में, “हमारा देश समस्त विश्व है, हमारे देशवासी सम्पूर्ण मानव-जाति के हैं। हम अपनी जन्मभूमि को उसी तरह प्रेम करते हैं, जिस प्रकार हम अन्य देशों को प्रेम करते हैं।”
संक्षिप्त रूप में कहा जा सकता है कि अन्तर्राष्ट्रीयता ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धान्तों पर आधारित वह मनोभावना है जिसके वशीभूत होकर कोई व्यक्ति स्वयं को देश का नागरिक होने के साथ-साथ समस्त विश्व का नागरिक समझने लगती है और एक राष्ट्र अन्य राष्ट्रों के साथ परस्पर सहयोग एवं मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करके विश्व-शान्ति की स्थापना करने का प्रयत्न करता है।

अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में सहायक तत्त्व
अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में अनेक तत्त्वों ने अपना योगदान दिया है, जिनमें से कुछ प्रमुख तत्त्वों का वर्णन निम्नलिखित है-

⦁    विश्व-बन्धुत्व – विश्व-बन्धुत्व की धारणा अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में एक प्रमुख सहायक तत्त्व है। सभी मनुष्य भाई-भाई हैं। सबको एक ही ईश्वर ने जन्म दिया है। इन आध्यात्मिक सिद्धान्तों ने अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बहुत योग दिया है।
⦁    औद्योगिक क्रान्ति तथा आर्थिक अन्योन्याश्रितता – 19वीं शताब्दी में हुई औद्योगिक क्रान्ति ने विश्व की अर्थव्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन कर दिये। वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि हुई, अतिरिक्त उत्पादन की खपत के लिए बाजारों की खोज की गयी तथा राज्यों में आत्मनिर्भरता बढ़ी। इस आर्थिक आदान-प्रदान ने राष्ट्रों को परस्पर निकट लाने में सहायता प्रदान की तथा अन्तर्राष्ट्रीयता को प्रोत्साहन मिला।
⦁    वैज्ञानिक आविष्कार – आज के वैज्ञानिक युग में विभिन्न आविष्कारों ने राष्ट्रों के बीच सम्पर्क स्थापित करने में सहायता दी है। टेलीफोन, टेलीग्राम, रेल, वायुयान, मोटर, रेडियो, टेलीविजन आदि के द्वारा विविध राष्ट्रों के बीच आवागमन तथा सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में आदान-प्रदान होने लगे हैं। सम्पूर्ण विश्व आज एक इकाई के रूप में प्रतीत होता है। इससे अन्तर्राष्ट्रीयता को विशेष प्रोत्साहन मिला है।
⦁    समाचार-पत्र तथा साहित्य – समाचार-पत्रों तथा साहित्य ने भी अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना के विकास में पर्याप्त योगदान दिया है। समाचार-पत्र एवं साहित्य का अध्ययन करने से उन्हें एक-दूसरे के जीवन, संस्कृति आदि के विषय में व्यापक जानकारी प्राप्त होती है तथा उनमें अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित होता है।
⦁    विशुद्ध राष्ट्रीयता – विशुद्ध (उदार) राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में सहायक होती है। उग्र-राष्ट्रीयता एक संकुचित धारणा है, जब कि विशुद्ध राष्ट्रीयता मानवतावादी दृष्टिकोण की पोषक है।
⦁    अन्तर्राष्ट्रीय कानून – विभिन्न राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों व व्यवहार के नियमन हेतु अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का निर्माण किया गया है। सभी देश इन कानूनों का आदर करते हैं और विवाद की स्थिति में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की शरण ली जाती है। इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय कानून भी अन्तर्राष्ट्रीयता में सहायक हुए हैं।
⦁    अन्तर्राष्ट्रीय खेल – अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में खेलों ने भी पर्याप्त योगदान दिया है। आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ओलम्पिक खेल, एशियाई खेल तथा अन्य प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं। ये प्रतियोगिताएँ भी अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में सहायक सिद्ध होती हैं।
⦁    अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन और संगठन – आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों में अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से विविध देशों के बीच मैत्री एवं सहयोगपूर्ण सम्बन्ध स्थापित होने लगे हैं। इन अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों व संगठनों से ऐसा वातावरण उत्पन्न होता है, जो अन्तर्राष्ट्रीयता के लिए। अत्यन्त उपयोगी होता है।

अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बाधक तत्त्व
अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में मुख्यतया निम्नलिखित तत्त्व बाधक सिद्ध होते हैं-
⦁    उग्र-राष्ट्रीयता – अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा संकुचित या उग्र-राष्ट्रीयता की है।
⦁    राज्यों की सम्प्रभुता – अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में दूसरी बड़ी बाधा राष्ट्रीय राज्यों की सम्प्रभुता है। सम्प्रभुता के आधार पर प्रत्येक राष्ट्र अपने क्षेत्र में अपने को सर्वोच्च समझता है। ऐसी परिस्थितियों में अन्तर्राष्ट्रीयता की स्थापना करना सर्वथा असम्भव है।
⦁    सैन्यवाद – आज विश्व में विभिन्न शक्तिगुट (Power Blocks) बने हुए हैं; जैसे- NATO, SEATO आदि। इनके कारण विश्व में शीत युद्ध की स्थिति बनी हुई है। यह सैन्यवाद भी अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक सिद्ध होता है।
⦁    पूँजीवाद व साम्राज्यवाद – अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में एक बाधा पूँजीवाद तथा साम्राज्यवाद है। पूँजीवादी देश निर्बल, अविकसित, अर्द्ध-विकसित देशों पर आधिपत्य स्थापित करता है। इस प्रकार पूँजीवाद साम्राज्यवाद का रूप धारण कर लेता है। साम्राज्यवादी नीतियाँ अन्तर्राष्ट्रीयता का तीव्र विरोध करती हैं।
⦁    राजनीतिक मतभेद – आज विभिन्न देशों की राजनीतिक गतिविधियाँ इस प्रकार की हो गयी हैं कि उनमें परस्पर संघर्ष व टकराव की स्थिति बनी रहती है। यह संघर्ष व टकराव अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक सिद्ध होता है।
⦁    राष्ट्रों की महत्त्वाकांक्षा – राष्ट्रों की बढ़ती महत्त्वाकांक्षाएँ व स्वार्थी प्रवृत्तियाँ भी अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक सिद्ध होती हैं।



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