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अनुसूचित जनजातियों की समस्याओं के चार कारण बताइए।

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भारतीय जनजातियों में व्याप्त समस्याओं में से चार मूल कारण निम्नवत् हैं

1. निर्धनता, अज्ञानता तथा विकास से वंचित रहना – जनजातीय लोगों की निर्धनता और अज्ञानता के कारण समाज के सम्पन्न वर्ग, व्यापारी वर्ग, नौकरशाह और राजनीतिज्ञ उनका मनमाना शोषण करते हैं। भारत सरकार और राज्य सरकारों ने जनजातियों के विकास के लिए करोड़ों रुपये की धनराशि स्वीकृत की है, लेकिन इस धनराशि का उपयोग उनके विकास कार्यों के लिए नहीं किया जाता। अज्ञानता ने जनजातियों में विभिन्न अन्धविश्वासों को जन्म दिया तथा इसका लाभ उठाकर समाज के अन्य वर्गों ने उनका शोषण किया।
2. पृथक और दूर-दराज क्षेत्रों में निवास – भारत की लगभग सभी जनजातियाँ पहाड़ों, जंगलों और दूर-दराज क्षेत्रों में निवास करती हैं, जहाँ उनका अन्य लोगों से सम्पर्क नहीं हो पाता। पृथक् एवं दुर्गम निवास के कारण वे अधिकतर प्रकृति पर ही निर्भर करती हैं। साधनों के अभाव के कारण वे ज्ञान-विज्ञान और भौतिक विकास की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाये।
3. स्थानान्तरित खेती और वन उपज के उपयोग और उपभोग पर रोक – ब्रिटिश शासन से पूर्व सभी जनजातियाँ राजनीतिक दृष्टि से स्वायत्त इकाइयाँ थीं। वे अपनी भूमि तथा जंगलों की स्वामी थीं। किन्तु अंग्रेजों ने सम्पूर्ण देश पर एकसमान राजनीतिक व्यवस्था लागू की, जिससे जनजातियों के अधिकार सीमित कर दिये गये तथा उनके द्वारा की जाने वाली स्थानान्तरित खेती एवं वन उपयोग और उपभोग पर रोक लगा दी गयी। स्वतन्त्रता-प्राप्ति और लोकतन्त्रीय व्यवस्था के बाद भी इस स्थिति में कोई परिवर्तन नजर नहीं आया। जनजातियाँ अपने आपको नयी व्यवस्था के अनुरूप ढालने में असफल रहीं।
4. ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म-परिवर्तन – ब्रिटिश शासन काल में ही ईसाई मिशनरियों ने आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश कर लिया था तथा उनकी निर्धनता एवं अज्ञानता का लाभ उठाते हुए कल्याण के नाम पर उनको ईसाई बनाना आरम्भ कर दिया। यह नया वर्ग अपने परम्परागत समाज से कट गया तथा इन दोनों के बीच टकराव की स्थिति जन्म लेने लगी। यह सांस्कृतिक विघटन की स्थिति थी।



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