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अपने मुग्ध मीत से बिछुड़कर कवि की आत्मा कैसे तड़प रही है?

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कवि कहता है कि मेरा जीवन अंधकारमय हो गया है। अतः हे मित्र तुम प्रकाश की किरण बनकर आ जाओ। मैं सूर्य-चंद्र की तरह प्रकाशमान हो सकूँ। तुम्हारे आने से प्रातः हुई और कोमल प्रीति मुस्कुराई। हे मेरे मित्र! जीवन-मृत्यु के साथी। मेरे पाप मिट जाए और आत्मा पवित्र हो जाये। मैं नतमस्तक हो तुम्हारा स्वागत करता हूँ।



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