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अपनी या अपने दोस्त अथवा रिश्तेदार की किसी व्यक्तिगत समस्या को चिह्नित कीजिए इसे समाजशास्त्रीय समझ द्वारा जानने की कोशिश कीजिए।”

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मान लीजिए कि आप, आपका कोई दोस्त अथवा रिश्तेदार उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बेरोजगार है। उसकी यह स्थिति “शिक्षित बेरोजगारी’ कहलाती है। वह इस बेरोजगारी के कारण निराश रहता है तथा परिवार एवं अन्य समूहों से उसका व्यवहार सामान्य नहीं होता। इस समस्या को जब कोई सामान्य बौद्धिक ज्ञान से देखने का प्रयास करता है तो वह यह सोच सकता है कि आपके दोस्त अथवा रिश्तेदार का भाग्य ही ऐसा है। भगवान ने उसका पढ़ना-लिखना तो सुनिश्चित किया था, परंतु रोजगार नहीं। यह भी हो सकता है कि वह दोस्त अथवा रिश्तेदार स्वयं आलसी हो तथा रोजगार करना ही न चाहता हो। यह भी संभव है कि परिवारवाद की भावना में जकड़े होने के कारण दूरदराज के क्षेत्र में रोजगार मिलने पर वह जाना ही नहीं चाहता है। आपका दोस्त अथवा रिश्तेदार ऐसे क्षेत्र में भी निवास करने वाला हो सकता है जिसमें रोजगार के अवसर ही उपलब्ध नहीं हैं। समाजशास्त्रीय समझ पहले तो बेरोजगारी को क्रमबद्ध रूप में परिभाषित करने तथा इसे समझने को प्राथमिकता देती है। यह समझ इस शिक्षित बेरोजगारी को जनहित मुद्दे के रूप में देखने तथा इसके कारणों की खोज करने पर बल देती है। लाखों-करोड़ों लोग उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भी बेरोजगार क्यों रहते हैं? जब समाजशास्त्रीय समुझ द्वारा इसे देखने का प्रयास किया जाएगा तो हो सकता है कि हमारा ध्यान शिक्षा-प्रणाली के दोषपूर्ण होने, उच्च शिक्षा में अत्यधिक छात्र संख्या होने, व्यावसायिक शिक्षा का अभाव होने अथवा देश में मॉग एवं पूर्ति में असंतुलन होने जैसे कारणों पर केंद्रित हो।

शिक्षित बेरोजगारी की भाँति निर्धनता, मद्यपान, मादक द्रव्य व्यसन जैसी व्यक्तिगत समस्या को यदि समाजशास्त्रीय समझ से देखने का प्रयास किया जाएगा तो हमारा नजरिया सामान्य बौद्धिक ज्ञान से देखने वाले नजरिये से पूर्णतः भिन्न होगा। इन व्यक्तिगत समस्याओं को भी हम जनहित के मुद्दों के रूप में देखेंगे तथा इनके कारणों का पता लगाने का प्रयास करेंगे। यदि सम्भव हो तो इनका समाधान भी बताएँगे।



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