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अस्थि-संस्थान या अस्थि-तन्त्र से आप क्या समझती हैं? अस्थि-संस्थान (कंकाल) का क्या कार्य है?यामनुष्य के शरीर में अस्थि-संस्थान (कंकाल-तन्त्र) की क्या उपयोगिता है?याकंकाल-तन्त्र (अस्थि-संस्थान) या अस्थि-पंजर की हमारे शरीर में क्या उपयोगिता है? मानव शरीर में कुल कितनी अस्थियाँ होती हैं?यायदि शरीर में हड्डियाँ न होतीं तो क्या हानि होती?

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अस्थि-संस्थान का अर्थ एवं कार्य
यह सत्य है कि बाहर से देखने पर शरीर की हड्डियाँ या अस्थियाँ दिखाई नहीं देतीं, परन्तु यदि शरीर की त्वचा तथा मांसपेशियाँ आदि हटा दी जाएँ, तो अन्दर केवल अस्थियों का ढाँचा मात्र रह जाएगा। इसके अतिरिक्त यदि ऊपर से ही शरीर के किसी भाग को हाथ से टटोला जाए, तो त्वचा के नीचे मांस और मांस के नीचे एक प्रकार की कठोर रचना महसूस होती है। ये कठोर रचना अस्थियाँ ही हैं। शरीर में विभिन्न अस्थियाँ आपस में व्यवस्थित रूप से सम्बद्ध रहती हैं। शरीर की सभी अस्थियाँ परस्पर सम्बद्ध होकर ही कार्य करती हैं। शरीर में अस्थियों की इस व्यवस्था को ही अस्थि-संस्थान या कंकाल-तन्त्र (Skeletal system) कहते हैं। अस्थि-संस्थान ही शरीर को दृढ़ता, आकृति तथा गति प्रदान करता है। अस्थि-संस्थान में अनेक अस्थियाँ तथा अस्थि-सन्धियाँ पाई जाती हैं।

कंकाल अथवा अस्थि-संस्थान की उपयोगिता
हमारे शरीर में उपस्थित लगभग 206 अस्थियाँ सम्मिलित रूप से कंकाल अथवा अस्थि-संस्थान का निर्माण करती हैं। अस्थि-संस्थान हमारे शरीर का एक निश्चित ढाँचा है, जिसकी उपयोगिता निम्नवर्णित हैं

(1) निश्चित आकार प्रदान करना:
कंकाल अथवा अस्थि-संस्थाने हमारे शरीर को एक निश्चित आकार प्रदान करता है। अस्थियों के अभाव में मानव-शरीर मांस के एक लोथड़े के समान ही होता, जो न तो सीधा खड़ा हो सकता और न ही इसका कोई स्थिर आकार ही होता। वास्तव में अस्थि-संस्थान के द्वारा ही व्यक्ति के शरीर की लम्बाई एवं चौड़ाई का निर्धारण होता है।

(2) दृढता प्रदान करना:
अस्थि-संस्थान शरीर को भली-भाँति साधे रहता है। शरीर के लगभग सभी भागों को सुदृढ़ रखने में अस्थियों का भरपूर योगदान रहता है। अस्थि-संस्थान के ही कारण हमारा शरीर बाहरी आघातों को सहन कर लेता है। अस्थि-संस्थान के माध्यम से ही हम भारी-से-भारी बोझ को भी उठा लिया करते हैं।

(3) कोमल अंगों को सुरक्षा प्रदान करना:
भिन्न-भिन्न स्थानों पर अस्थियाँ कोमल अंगों को कवच प्रदान करती हैं; जैसे–पसलियाँ फेफड़ों व हृदय को, मेरुदण्ड सुषुम्ना नाड़ी को तथा कपाल मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करता है।

(4) पेशियों को संयुक्त होने का स्थान प्रदान करना:
विभिन्न स्थानों पर पेशियाँ अस्थियों से जुड़ी रहती हैं। पेशियाँ अस्थियों को सबल एवं सचल बनाती हैं।

(5) शरीर को गतिशीलता प्रदान करना:
अस्थि-संस्थान में अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों पर सन्धियाँ होती हैं। अस्थियों, सन्धियों एवं पेशियों के पारस्परिक सहयोग से शरीर व इसके अन् गतिशील होते हैं।

(6) लाल एवं श्वेत रक्त कणिकाओं का निर्माण:
प्रत्येक अस्थि के मध्य भाग में अस्थि-मज्जा होती है। अस्थि-मज्जा में रुधिर की लाल एवं श्वेत कणिकाओं का निर्माण होता है।

(7) श्वसन में सहयोग देना:
ट्रैकिया अथवा वायुनलिका के छल्ले एवं पसलियाँ फेफड़ों को फूलने के संकुचन करने में सहायता प्रदान करती हैं।

(8) श्रवण में सहयोग देना:
कान की कॉर्टिलेज अस्थियाँ श्रवण क्रिया में सहयोग प्रदान करती हैं।

(9) नेत्रों को सहयोग देना:
हमारे नेत्र कपाल में बने अस्थि गड्ढों में सुरक्षित रहते हैं। इनमें उपस्थित पेशियाँ नेत्रों की गति को नियन्त्रित करती हैं।

(10) उत्तोलक का कार्य करना:
बोझा ढोते एवं सामान उठाते समय मेरुदण्ड एक उत्तम उत्तोलक का कार्य करता है।
अस्थियों (हड्डियों) की बनावट (रचना)

अस्थियाँ मानव शरीर का सबसे कठोर भाग होती हैं। मुख्य अस्थियों से भिन्न कुछ उपास्थियाँ मुलायम भी होती हैं जिन्हें कार्टिलेज कहते हैं। अस्थियों का निर्माण जीवित कोशिकाओं से होता है। अस्थियाँ सफेद रंग की तथा छूने में कठोर होती हैं। अस्थियाँ भीतर से खोखली होने के कारण कठोर होते हुए भी हल्की होती हैं। अस्थियों में एक नली होती है जिसके अन्दर एक गूदेदार पदार्थ भरा होता है, जिसे अस्थिमज्जा (Bone marrow) कहते हैं। जिस खोखले स्थान पर यह अस्थि-मज्जा होती है, उसे अस्थि-गुहा कहते हैं। अस्थि-मज्जा में लाल और श्वेत रक्त कण बनते हैं। नली के चारों ओर असंख्य अस्थि-कोशिकाएँ होती हैं। ये कोशिकाएँ टूटी हुई अस्थि को जोड़ने में भी सहायक होती हैं। अस्थि-नली में रक्तवाहिनी और नाड़ी सूत्र होते हैं। इसी कारण जीवित मनुष्य की अस्थि का रंग कुछ गुलाबीपन लिए होता है और मृत अवस्था में उसका रंग श्वेत हो जाता है। अस्थियां एक आवरण से ढकी रहती हैं, जिसे अस्थिच्छद कहते हैं। यह आवरण बहुत बड़ा होता है तथा मांसपेशियों से जुड़ा रहता है। अस्थियों का निर्माण विभिन्न खनिजों से होता है। इनमें मुख्य हैं-कैल्सियम फॉस्फेट, कैल्सियम कार्बोनेट तथा मैग्नीशियम फॉस्फेट। इनमें सर्वाधिक मात्रा कैल्सियम फॉस्फेट की ही होती है।

अस्थियों का विकास जीवन के आरम्भ से ही होना शुरू हो जाता है। भ्रूणावस्था में पूरा-का-पूरा कंकाल उपास्थि का ही होता है, परन्तु जन्म के उपरान्त इसका अधिकांश भाग हड्डी में परिवर्तित हो जाता है। यह परिवर्तन उपास्थि के मैट्रिक्स (Matrix) में चूने तथा फॉस्फोरस के लवणों के जमने या निक्षेपण (Deposition) से होता है और इस क्रिया को अस्थि-भवन कहते हैं।

अस्थि-संस्थान के भाग
मानव अस्थि-संस्थान को निम्नलिखित तीन मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है

(1) सिर अथवा खोपड़ी:
खोपड़ी में कपाल (जिसमें मस्तिष्क सुरक्षित रहता है) तथा आनन (चेहरा) सम्मिलित रहते हैं।

(2) धड़:
वक्ष एवं उदर धड़ के दो भाग होते हैं। वक्ष में रीढ़ की अस्थि, उरोस्थि, हॅसली की अस्थियाँ, कन्धे की अस्थियाँ, पसलियाँ तथा नितम्ब की अस्थियाँ आदि होती हैं, जबकि उदर . अस्थिविहीन होता है।

(3) शाखाएँ:
शाखाओं में दो जोड़े होते हैं-ऊर्ध्व शाखाएँ (भुजाएँ) तथा अधोशाखाएँ (डाँगें)।



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