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अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ के जीवन एवं उनकी रचनाओं पर प्रकाश डालिए। याअयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। 

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जीवन-परिचय-श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आधुनिक हिन्दी खड़ी बोली के प्रथम महाकवि थे। इन्होंने काव्य के क्षेत्र में भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से नये-नये प्रयोग किये और युगानुरूप नवीन आदर्शों की प्रतिष्ठा की। हरिऔध का जन्म संवत् 1922 वि० (सन् 1865 ई०) में ग्राम निजामाबाद (जिला आजमगढ़) के एक सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित भोलासिंह और माता का नाम रुक्मिणी देवी था। भोलासिंह के बड़े भाई पं० ब्रह्मसिंह ज्योतिष के अच्छे विद्वान् थे। हरिऔध जी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्हीं की देख-रेख में हुई। मिडिल परीक्षा पास करने के पश्चात् ये काशी के क्वींस कॉलेज में पढ़ने के लिए भेजे गये, किन्तु अस्वस्थता के कारण पढ़ न सके। इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी और उर्दू का अध्ययन किया। संवत् 1939 वि० (सन् 1882 ई०) में इनका विवाह हुआ। विवाह के पश्चात् इन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, इसलिए सर्वप्रथम इन्होंने निजामाबाद के तहसीली स्कूल में लगभग तीन वर्ष तक अध्यापन-कार्य किया। तदुपरान्त ये कानूनगो हो गये और उत्तरोत्तर उन्नति कर सदर कानूनगो के पद पर पहुँच गये। संवत् 1966 वि० (सन् 1909 ई०) में सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अवैतनिक अध्यापक हो गये। सन् 1941 ई० तक वे इसी पद पर रहे। इसके पश्चात् अवकाश ग्रहण कर आजमगढ़ को अपना निवासस्थान बनाया और वहीं रहकर साहित्य-सेवा में अपना जीवन लगा दिया। यहीं संवत् 2002 (सन् 1945 ई० ) में इनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ–हरिऔध जी द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि थे। इन्होंने खड़ी बोली को नया रूप प्रदान किया तथा प्राचीन कथानकों में नवीन उद्भावनाएँ समाहित कीं। भाषा की विविधता के साथ-साथ इन्होंने हिन्दी छन्दों में भी नवीन छन्द-पद्धति की उद्भावना की। इनके काव्य में वात्सल्य रस एवं विप्रलम्भ श्रृंगार का जगमगाता रूप झलकता है।

रचनाएँ–हरिऔध जी ने गद्य-पद्य दोनों में ही सफलतापूर्वक रचना की है। इनके द्वारा रचे गये काव्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है—(1) प्रियप्रवास, (2) वैदेही-वनवास, (3) रस-कलश, (4) चौखे-चौपदे और चुभते-चौपदे, (5) इनके अतिरिक्त हरिऔध जी के अन्य काव्य-ग्रन्थ इस प्रकार हैं-(i) रुक्मिणीपरिणय, (ii) प्रद्युम्न-विजय, (iii) बोलचाल, (iv) पद्य-प्रसून, (v) पारिजात, (vi) ऋतु-मुकुर, (vii) काव्योपवन, (viii) प्रेम-पुष्पोपहार, (ix) प्रेम-प्रपंच, (४) प्रेमाम्बु-प्रस्रवण, (xi) प्रेमाम्बु-वारिधि। (6) इनके प्रमुख उपन्यास निम्नलिखित हैं- (i) ठेठ हिन्दी का ठाठ, (ii) अधखिला फूल, (iii) प्रेमकान्ता।

साहित्य में स्थान-नि:संकोच हम यह कह सकते हैं कि हरिऔध जी की काव्य-प्रतिभा विविधरूपिणी है। वे अपनी रचनाओं में कहीं रीतिकालीन हैं तो कहीं भारतेन्दुकालीन, कहीं द्विवेदीकालीन हैं तो कहीं नवयुगकालीन। इनके इन समस्त रूपों में इनका द्विवेदीकालीन रूप ही प्रमुख है। भाव और भाषा दोनों ही क्षेत्रों में इन्होंने नये-नये प्रयोग किये और आधुनिक युगानुरूप नवीन उद्भावनाएँ भी दीं। निश्चय ही ये हिन्दी के गौरव हैं।



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