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बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन कीजिए। |
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Answer» बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा- बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ अथवा ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि उसके आक्रमण के समय भारत में पाँच मुस्लिम राज्य और दो काफिर (हिन्दू) राज्य थे। देहली, मालवा, बंगाल, गुजरात व बहमनी राज्य मुस्लिम शासकों के अधीन थे तथा मेवाड़ व विजयनगर हिन्दू शासकों के अधीन थे। बाबर का यह कथन सही है कि “सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में भारत केवल ऐसे राज्यों का समूह था, जो किसी भी आक्रमणकारी का, जो उसे विजित करने की शक्ति और इच्छा रखता हो, सरलता से शिकार हो सकता था।” (i) पंजाब – बाबर के आक्रमण के समय पंजाब का सूबेदार दौलत खाँ लोदी था। यद्यपि वह दिल्ली साम्राज्य के अधीन था, लेकिन अपने आपको स्वतन्त्र शासक के रूप में देखना चाहता था। इतिहासकारों के अनुसार उसने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी और इब्राहीम लोदी को समाप्त करने के लिए काबुल के शासक बाबर से पत्र-व्यवहार कर रहा था। उसने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था। (ii) गुजरात – सुदूर पश्चिम में स्थित गुजरात का शासक मुजफ्फरशाह था। उसने गुजरात पर 1511 ई० से लेकर 1526 ई० तक राज्य किया। अपने शासनकाल में वह मालवा और मेवाड़ के पड़ोसी राज्यों के साथ युद्धों में व्यस्त रहा। पानीपत के युद्ध के कुछ ही दिन पूर्व उसका देहान्त हो गया और तब उसका पुत्र बहादुरशाह गुजरात का शासक बना। वह बड़ा योग्य और सफल शासक सिद्ध हुआ। आगे चलकर उसका मुगल सम्राट हुमायूं से काफी संघर्ष हुआ। (iii) दिल्ली – बाबर के आक्रमण के समय उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध राज्य दिल्ली था। इसका सम्पूर्ण वैभव समाप्त हो चुका था। कहने को तो दिल्ली का सुल्तान विशाल साम्राज्य का स्वामी था, किन्तु व्यवहारिक दृष्टि से उसका प्रभाव केवल दिल्ली और उसके आसपास के कुछ प्रदेशों तक ही सीमित रह गया था। बाबर के आक्रमण के समय दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी था। उसके कठोर और मनमाने व्यवहार से उसके सूबेदार, सैनिक, अधिकारी और राज दरबारी तंग आ चुके थे। वे सब उसके पतन के आकाँक्षी थे। (iv) बिहार – फिरोज तुगलक के शासनकाल में बिहार स्वतन्त्र हो गया था। बाबर के आक्रमण के समय बिहार शक्तिशाली मुस्लिम राज्य था। (v) मालवा – तैमूर के आक्रमण के तुरन्त बाद मालवा के सूबेदार दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था। | मालवा के शासक महमूद खिलजी द्वितीय के शासनकाल में मेदिनीराय नामक एक राजपूत सरदार का दबदबा बढ़ गया था। उससे अप्रसन्न होकर मुस्लिम सरदारों ने उसका विरोध किया। मेदिनीराय ने महाराणा सांगा की सहायता से उन्हें परास्त | कर दिया। इस प्रकार मालवा के सरदारों में आपसी फूट बढ़ गई। (vi) उड़ीसा (ओडिशा) – यह राज्य काफी समय से हिन्दू राजाओं के अधीन था। यह समृद्ध एवं शक्तिशाली राज्य था, किन्तु दिल्ली से अत्यधिक दूर स्थित होने के कारण उत्तर भारत की राजनीति में उसकी विशेष भूमिका न थी। (vii) सिन्ध- महमूद तुगलक की मृत्यु होते ही सिन्ध राज्य स्वतन्त्र हो गया था। बाबर के भारत पर आक्रमण के समय यहाँ अरबों का अधिकार स्थापित हो गया था। सिन्ध पर अरब वालों का प्रभाव था। यहाँ की राजनैतिक व्यवस्था अत्यन्त ही असन्तोषजनक थी। (viii) बंगाल – बाबर के आक्रमण के समय बंगाल एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में स्थापित था, जहाँ का प्रशासक नुसरतशाह था। वह बड़ा योग्य और गुणवान व्यक्ति था। लोग उसके शासनकाल में आर्थिक दृष्टि से समृद्ध और सन्तुष्ट थे। (ix) कश्मीर – कश्मीर भी एक महत्वपूर्ण राज्य था। यहाँ सत्ता के लिए आन्तरिक संघर्ष चल रहा था। यहाँ के प्रधान वजीर ने अपने स्वामी सुल्तान मुहम्मदशाह को बाबर की सहायता से अपदस्थ कर स्वयं सत्ता हथिया ली। (x) मेवाड़ – मेवाड़ उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध हिन्दू राज्य था, जिस पर राणा साँगा अथवा राणा संग्रामसिंह का शासन था। कर्नल टॉड के अनुसार राणा साँगा का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण राजपूताने पर था। राणा साँगा ने मालवा के अनेक भागों पर अधिकार कर लिया था। उसने गुजरात के शासक को भी हराया था। राणा साँगा का उद्देश्य भारत में फिर से हिन्दू राज्य स्थापित करना था। राणा साँगा निःसन्देह उत्तरी भारत का ही नहीं सम्पूर्ण भारत के शक्तिशाली शासकों में से था, जिससे बाबर को टक्कर लेनी थी। (xi) पुर्तगाल शक्ति – यद्यपि बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों की शक्ति अधिक नहीं थी फिर भी उन्होंने गोआ पर अधिकार जमा लिया था। अपनी गतिविधियों के कारण उन्होंने भारत के पश्चिमी समुद्र तट के राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन में अस्थिरता ला दी थी। (xii) खानदेश – ताप्ती नदी की घाटी में बसा हुआ खानदेश छोटा-सा किन्तु एक समृद्धशाली राज्य था। मलिक राजा फारुकी, मलिक नसीर खाँ तथा आदिल खाँ फारुकी खानदेश के प्रसिद्ध शासक थे। आदिल खाँ फारुकी की मृत्यु के पश्चात् महमूद प्रथम यहाँ का शासक बना। यह बाबर का समकालीन था। (xiii) बहमनी राज्य – बहमनी राज्य अपने वैभव को खोकर जीर्ण-शीर्ण हो चुका था। उसके स्थान पर अब बीजापुर, बरार, बीदर, अहमदनगर और गोलकुण्डा के पाँच स्वतन्त्र राज्य स्थापित हो चुके थे। इन राज्यों के शासकों में भी परस्पर संघर्ष होता रहता था। इनकी आपसी फूट से उत्साहित होकर विजयनगर का शक्तिशाली हिन्दू राजा कृष्णदेवराय उन्हें अपने आक्रमण का शिकार बनाता रहता था। इस प्रकार बाबर के आक्रमण के समय दक्षिण में मुस्लिम शक्ति अपने अन्तिम दिन गिन रही थी। (xiv) विजयनगर – यह हिन्दू राज्य सुदूर दक्षिण में स्थित था। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ का राजा कृष्णदेवराय था। के०एम० पणिक्कर के शब्दों में वह अशोक, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, हर्ष और भोज की परम्परा में एक महान् सम्राट था, जिसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था।” बाबर ने भी विजयनगर के बारे में लिखा है कि राज्य एवं सैनिक दृष्टि से काफिर राजकुमारों में विजयनगर का राजा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।” उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बाबर के आक्रमण के समय केन्द्रीय शक्ति का पतन हो चुका था तथा समस्त देश में स्वतन्त्र शासक अपनी सत्ता बढ़ाने के लिए पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता में लीन थे। उनमें एकता का अभाव था। लेनपूल ने उस समय की दशा का वर्णन करते हुए लिखा है कि विजेता जाति (मुसलमान) अशांतकारियों की एक भीड़ में बदल गई थी। दिल्ली सल्तनत के बड़े-बड़े प्रान्तों के अपने शासक थे। छोटे-छोटे नगरों, जिलों, यहाँ तक कि दुर्गों आदि पर वहाँ के सरदारों ने अधिकार कर लिया था। इस प्रकार बाबर के लिए भारत पर आक्रमण हेतु उपयुक्त परिस्थितियाँ थीं। |
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