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बापू की कुटिया में आकर लेखक अपना सौभाग्य क्यों मानता है ?

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लेखक गांधीजी के जीवित रहते उनके साबरमती आश्रम नहीं आ पाया। वह इसे अपना दुर्भाग्य मानता है। उनके न रहने पर उनकी कुटी में आने पर उसे लगता है कि यदि वह उन दिनों आता तो उनके बिस्तर के निकट इतनी देर तक न बैठ पाता। उस शांत एकांत में उनकी कुटिया से इतना तादात्म्य स्थापित करने का सुख भी उसे न मिल पाता। उनके पायताने बैठकर वह अपनी लेखनी को सार्थकता भी प्रदान न कर पाता। जो तब न मिलता वह आज पाने का अवसर मिलने से लेखक स्वयं को सौभाग्यशाली मानता है।



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