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“बेरोजगारी एक समस्या है।” विवेचना कीजिए।याभारत के विशेष सन्दर्भ में ‘बेकारी के प्रकारों की विवेचना कीजिए।याबेरोजगारी किसे कहते हैं ? भारत में बेरोजगारी के कारण एवं निवारण के उपाय बताइए।याबेरोजगारी से आप क्या समझते हैं? बेरोजगारी समाप्त करने के सुझाव दीजिए।याभारत में बेरोजगारी दूर करने के उपाय बताइए। [2009, 10, 16]याभारत में बेकारी के कारणों का विश्लेषण कीजिए और इसके उन्मूलन के सुझाव दीजिए।याबेरोजगारी भारतीय निर्धनता को आधारभूत कारण है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» बेरोजगारी का अर्थ तथा परिभाषाएँ प्रायः जब किसी व्यक्ति को अपने जीवन-निर्वाह के लिए कोई कार्य नहीं मिलता तो उस व्यक्ति को बेरोजगार और इस समस्या को बेरोजगारी की समस्या कहते हैं। अन्य शब्दों में, जब कोई व्यक्ति कार्य करने का इच्छुक हो और वह शारीरिक व मानसिक रूप से कार्य करने में समर्थ भी हो, लेकिन उसको कोई कार्य नहीं मिलता जिससे कि वह अपनी जीविका कमा सके, तो इस प्रकार के व्यक्ति को बेरोजगार कहा जाता है। जब समाज में इस प्रकार के बेरोजगार व्यक्तियों की पर्याप्त संख्या हो जाती है, तब उत्पन्न होने वाली आर्थिक स्थिति को बेरोजगारी की समस्या कहा जाता है। गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “बेकारी वह दशा है जिसमें एक समर्थ एवं कार्य की इच्छा रखने वाला व्यक्ति, जो साधारणतया स्वयं के लिए एवं अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी कमाई पर आश्रित रहता है, लाभप्रद रोजगार पाने में असमर्थ रहता है।” बेकारी के प्रकार बेकारी अनेक प्रकार की है। इसके कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं ⦁ छिपी बेकारी – जो बेकारी प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती उसे छिपी बेकारी कहते हैं। इसका कारण किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोगों का लगे होना है। यदि उनमें से कुछ व्यक्तियों को हटा लिया जाए, तो भी उस कार्य या उत्पादन में कोई अन्तर नहीं आएगा। ऐसी बेकारी छिपी बेकारी कहलाती है। भारत में बेरोजगारी के कारण भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं 1. तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या – भारत में जनसंख्या 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है, जब कि रोजगार के अवसरों में इस दर से वृद्धि नहीं हो रही है। जनसंख्यावृद्धि दर के अनुसार भारत में प्रति वर्ष लगभग 50 लाख व्यक्तियों को रोजगार के अवसर सुलभ होने चाहिए। जनसंख्या की स्थिति विस्फोटक होने के कारण हमारे देश में बेरोजगारी विद्यमान है। 2. दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली – हमारे देश की शिक्षा-पद्धति दोषपूर्ण है। यह शिक्षा रोजगारमूलक नहीं है, जिससे शिक्षित बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख शिक्षित व्यक्ति बेरोजगारों की पंक्ति में सम्मिलित हो जाते हैं। 3. लघु एवं कुटीर उद्योगों का पतन – मशीनों का प्रयोग बढ़ने तथा देश में औद्योगीकरण के कारण हस्तकला तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास मन्द हो गया है या प्रायः पतन हो गया है, जिससे बेरोजगारी में वृद्धि होती जा रही है। 4. त्रुटिपूर्ण नियोजन – यद्यपि भारत में सन् 1951 से आर्थिक नियोजन के द्वारा देश का आर्थिक विकास किया जा रहा है, परन्तु पाँचवीं पंचवर्षीय योजना तक नियोजन में रोजगारमूलक नीति नहीं अपनायी गयी, जिसके कारण बेरोजगारों की संख्या बढ़ती गयी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार का ध्यान इस समस्या की ओर गया। अतः त्रुटिपूर्ण नियोजन भी बेरोजगारी के लिए उत्तरदायी है।। 5. पूँजी-निर्माण एवं निवेश की धीमी गति – हमारे देश में पूँजी-निर्माण की गति धीमी है। पूँजी निर्माण की धीमी गति के कारण पूँजी-निवेश भी कम ही हो पाया है, जिसके कारण उद्योग-धन्धों का विस्तार वांछित गति से नहीं हो पा रहा है। भारत में बचत एवं पूँजी निवेश में कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हुई है। 6. आधुनिक यन्त्रों एवं मशीनों का प्रयोग – स्वचालित मशीनों एवं कम्प्यूटरों के प्रयोग से श्रमिकों की माँग कम होती जा रही है। उद्योग व कृषि के क्षेत्र में भी यन्त्रीकरण बढ़ रहा है। औद्योगीकरण के साथ-साथ यन्त्रीकरण एवं अभिनवीकरण में भी वृद्धि हो रही है, जिसके कारण बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है। 7. व्यक्तियों में उचित दृष्टिकोण का अभाव – हमारे देश में शिक्षित एवं अशिक्षित सभी नवयुवकों का उद्देश्य नौकरी प्राप्त करना है। श्रम के प्रति निष्ठावान न होने के कारण वे स्वतः उत्पादन प्रक्रिया में भागीदार नहीं होना चाहते हैं। वे कोई व्यवसाय नहीं करना चाहते हैं। इस कारण भी बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। 8. शरणार्थियों का आगमन – भारत में बेरोजगारी में वृद्धि का एक कारण शरणार्थियों का आगमन भी है। देश-विभाजन के समय, बाँग्लादेश युद्ध के समय तथा श्रीलंका समस्या उत्पन्न होने से भारी संख्या में शरणार्थी भारत में आये हैं, साथ ही गत वर्षों में भारत के मूल निवासियों को कुछ देशों द्वारा निकाला जा रहा है। इन देशों में ब्रिटेन, युगाण्डा, कीनिया आदि प्रमुख हैं। वहाँ से भारतीय मूल के निवासी भारत आ रहे हैं, जिसके कारण बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। 9. कृषि की अनिश्चितता – भारत एक कृषि-प्रधान देश है। अधिकांश व्यक्ति कृषि पर ही निर्भर हैं। भारतीय कृषि प्रकृति पर निर्भर है। प्रतिवर्ष कभी सूखा और कभी बाढ़, कभी अतिवृष्टि और कभी अनावृष्टि व अन्य प्राकृतिक प्रकोप आते रहते हैं, जिसके कारण लाखों श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं। कृषि की अनिश्चितता के कारण रोजगार में भी अनिश्चितता बनी रहती है। इस कारण बेरोजगारी बढ़ जाती है। 10. एक व्यक्ति द्वारा अनेक व्यवसाय – भारतीय श्रमिक कृषि-कार्य के साथ-साथ अन्य व्यवसाय भी करते हैं। इस कारण भी बेरोजगारी में वृद्धि होती है। 11. आर्थिक विकास की धीमी गति – भारत में बेरोजगारी में वृद्धि का एक कारण आर्थिक विकास की धीमी गति रही है। अभी भी देश के प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। इस कारण रोजगार के साधनों का वांछित विकास नहीं हो पाया है। 1. जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण – भारत में बेरोजगारी को कम करने के लिए सबसे पहले देश की जनसंख्या को नियन्त्रित करना होगा। परिवार नियोजन का राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार, सन्तति निरोध की सरल, सुरक्षित तथा व्यावहारिक विधियाँ इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध होंगी। 2. आर्थिक विकास को तीव्र गति प्रदान करना – देश का आर्थिक विकास तीव्र गति से करना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण दोहन करके रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जा सकती है। 3. शिक्षा – प्रणाली में परिवर्तन – शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। आज की शिक्षा व्यवसाय मूलक होनी चाहिए। शिक्षा को रोजगार से सम्बद्ध कर देने से बेरोजगारी की समस्या कुछ सीमा तक स्वतः ही हल हो जाएगी। देश की नयी शिक्षा-नीति में इस ओर विशेष ध्यान दिया गया है। 4. लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धों का विकास – आज की परिस्थितियों में यह आवश्यक हो गया है कि देश में योजनाबद्ध आधार पर लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास किया जाए, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। अत: कृषि से सम्बन्धित उद्योगों के विकास की अधिक आवश्यकता है। इसके द्वारा प्रच्छन्न बेरोजगारी तथा मौसमी बेरोजगारी दूर करने में सहायता मिलेगी। 5. बचतों में वृद्धि की जाए – देश के आर्थिक विकास के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। पूँजी-निर्माण बचतों पर निर्भर रहता है। अत: बचतों में वृद्धि करने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किये जाने चाहिए। 6. उद्योग-धन्धों का विकास- भारत में पूँजीगत, आधारभूत एवं उपभोग सम्बन्धी उद्योगों का विस्तार एवं विकास किया जाना चाहिए। भारत में श्रमप्रधान उद्योगों का अभाव है, कार्यरत उद्योगों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। अत: रोगग्रस्त उद्योगों का उपचार आवश्यक है। मध्यम व छोटे पैमाने के उद्योगों की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि अधिक बड़े उद्योगों की अपेक्षा मध्यम श्रेणी के उद्योगों में रोजगार के अवसर अधिक सुलभ हो सकते हैं। 7. विदेशी व्यापार में वृद्धि – भारत के निर्यात में वृद्धि करने की आवश्यकता है, क्योंकि वस्तुओं के अधिक निर्यात के द्वारा उत्पादन वृद्धि को प्रोत्साहन मिलेगी, जिससे बेरोजगारी की समस्या हल होगी। 8. मानव-शक्ति का नियोजन – हमारे देश में मानव-शक्ति का नियोजन अत्यन्त दोषपूर्ण है। अत: यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक ढंग से मानव-शक्ति का नियोजन किया जाए, जिससे मॉग एवं पूर्ति के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके। 9. प्रभावपूर्ण रोजगार – नीति – देश में बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिए प्रभावपूर्ण रोजगार-नीति अपनायी जानी चाहिए। स्वरोजगार कार्यक्रम का विकास एवं विस्तार किया जाना चाहिए। रोजगार कार्यालयों की कार्य-प्रणाली को प्रभावशाली बनाने की अधिक आवश्यकता है। भारत में आज भी बेरोजगारी से सम्बन्धित ठीक आँकड़े उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, जिससे एक सबल और संगठित बेरोजगारी निवारण-नीति नहीं बन पाती है। अत: आवश्यकता यह है कि बेरोजगारी से सम्बन्धित सही आँकड़े एकत्रित किये जाएँ और उनके समाधान हेतु एक दीर्घकालीन योजना क्रियान्वित की जाए। 10. निर्माण-कार्यों का विस्तार – देश में निर्माण-कार्यो; जैसे – सड़कों, बाँधों, पुलों व भवन निर्माण आदि को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, जिससे बेरोजगारों को रोजगार देकर बेरोजगारी को कम किया जा सके। निर्माण कार्यों के क्रियान्वयन से रोजगार के नये अवसर बढ़ेंगे तथा रोजगार के बढ़े हुए अवसर बेकारी उन्मूलन के कारगर उपाय सिद्ध होंगे। |
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