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बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर निबन्ध लिखें।

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हमें हमारे देश और हमारी संस्कृति पर हमेशा गर्व रहा है। हजारों वर्षों से हमारे देश ने किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया। हम शांतिप्रिय रहे हैं। ऐसी महान सांस्कृतिक विरासत होने के बावजूद हमारे समाज में एक ऐसी बुराई है जो आज पूरे संसार के सामने हमें हमारी नजरें नीची करने के लिए मजबूर कर देती हैं। वो बुराई है पुरुषों की तुलना में स्त्री को दोयम दर्जे का स्थान देना। हमारा समाज इतना ज्यादा पुरुषप्रधान हो गया है कि आज देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा बेटी पैदा ही नहीं करना चाहता। इसीका नतीजा है कि हमारे देश में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या घटती जा रही है। इसी वजह से हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरुआत की।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना को एक राष्ट्रीय अभियान के माध्यम से कार्यान्वित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य है कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम, बालिकाओं के अस्तित्व को बचाना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा बालिकाओं की शिक्षा और भागीदारी सुनिश्चित करना। यह योजना न केवल लड़कियाँ बल्कि पूरे समाज के लिए एक वरदान साबित हो सकती है।

वर्तमान समय में अजन्मे बच्चे के लिंग का पता लगाने की सुविधा आसानी से उपलब्ध है। इस वजह से कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। लोग सोचते हैं कि लड़का बड़ा होकर पैसा कमाएगा। लड़की इसके विपरीत, दहेज़ लेकर घर से जाएगी। इस तरह के आर्थिक कारणों से लड़कियों के विरुद्ध सामाजिक पक्षपात होता रहा है। समाज में गहरे तक यह बात बैठी हुई है कि लड़कियाँ पैदा होते ही बड़ी जिम्मेदारी गले आ जाती है। इन कारणों से लिंगानुपात को नुकसान पहुंचा है। महिलाओं के जन्म से पहले ही उनके अधिकारों का हनन शुरू हो जाता है तथा जन्म के बाद भी उनके साथ भेदभाव नहीं थमता।

स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा की जरूरतों को लेकर उनके साथ कई तरह से पक्षपात होता है। लड़कियाँ को बोझ की तरह देखा जाता है जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। महिला सशक्तिकरण से समाज को पिछड़ेपन से मुक्ति मिलती है। यह ठीक ही कहा गया है कि एक पुरुष को शिक्षा देने से वह अकेला शिक्षित होता है लेकिन स्त्री की शिक्षा से समूचा परिवार अज्ञान के अंधेरे से निकल कर शिक्षित हो सकता है। एक शिक्षित माँ अपने बच्चों को शिक्षा और संस्कार तो देती ही है, उनके स्वास्थ्य का भी बेहतर ध्यान रखती है।

शिक्षित स्त्री घर-परिवार का प्रबंधन अधिक कुशलतापूर्वक कर सकती है, आय-अर्जन तथा अन्य कामों के मामले में पति का हाथ बँटाती है, अपने अधिकारों और दायित्वों को बेहतर रूप से समझती है और समाज में फैली कई बुराइयों के विरोध में खड़ी हो सकती है। इसलिए आज के समय में यह जरूरी है कि लड़कियों को लेकर शहरी तथा ग्रामीण भागों के लोगों के बीच फैली अंधविश्वासी मान्यताओं और प्रथाओं को खत्म किया जाए। कहीं पर भी कन्या भ्रूण हत्या हो रही हो तो तुरंत इसकी जानकारी पुलिस को दें। लोगों को इस बारे में सजग करे।

इसके लिए मीडिया और संचार के नए तरीकों का पूरी तरह से इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान इसी लक्ष्य को हासिल करने, इसके बारे में जागरूकता फैलाने और लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने के लिए शुरू किया गया है।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ सिर्फ एक योजना नहीं बल्कि देश के हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि एक समाज के रूप में हम इस समस्या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे, तो हम अपनी ही नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए भी एक भयंकर संकट को निमंत्रण देंगे।



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