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बहादुर शाह ने बंदा बहादुर के विरुद्ध जो युद्ध लड़े, उनका वर्णन करो।

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बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब के मुग़ल शासकों में हड़कंप मचा रखा था। जब यह समाचार मुग़ल सम्राट बहादुरशाह तक पहुंचा, तो वह क्रोधित हो उठा। उसने अपना सारा ध्यान पंजाब पर केन्द्रित कर दिया । 27 जून, 1710 ई० को वह अजमेर से पंजाब की ओर चल पड़ा। उसने दिल्ली तथा अवध के सूबेदारों तथा मुरादाबाद तथा इलाहाबाद के निज़ामों तथा फ़ौजदारों को आदेश दिया कि वे अपनी-अपनी सेनाओं सहित पंजाब में पहुंचे।

1. अमीनाबाद की लड़ाई- बंदा सिंह बहादुर की शक्ति को कुचलने के लिए बहादुर शाह ने सर्वप्रथम फिरोज़ खान मेवाती तथा महावत खान के अधीन सिक्खों के विरुद्ध एक विशाल सेना भेजी। इस सेना का सामना बिनोद सिंह तथा राम सिंह ने 26 अक्तूबर, 1710 ई० को अमीनाबाद (बनेसर तथा तरावड़ी के बीच) में किया । उन्होंने महावत खान को एक बार तो पीछे धकेल दिया, परन्तु शत्रु की संख्या बहुत अधिक होने के कारण सिक्खों को अन्त में पराजय का मुंह देखना पड़ा।

2. सढौरा की लड़ाई- जब बंदा सिंह बहादुर को सिक्खों की पराजय का समाचार मिला तो उसने अपने सैनिकों सहित शत्रु पर चढ़ाई कर दी। उस समय मुग़लों की विशाल सेना सढौरा में पड़ाव डाले हुए थी। 4 दिसम्बर, 1710 ई० को शत्र की सेना किसी उचित ठिकाने की खोज में निकली। अवसर का लाभ उठाकर सिक्खों ने उस पर धावा बोल दिया। उन्होंने शत्रु को बहुत क्षति पहुंचाई, परन्तु शाम को बहुत बड़ी संख्या में शाही सेना शत्रु की सेना से आ मिली। अतः सिक्खों ने लड़ाई छोड़ कर ‘लोहगढ़’ में शरण ली।।

3. लोहगढ़ का युद्ध- अब बहादुर शाह ने स्वयं बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध कार्यवाही करने का निर्णय किया। उसने सिक्खों की शक्ति का पता लगाने के लिए वज़ीर मुनीम खान को किले की ओर बढ़ने का आदेश दिया। परन्तु उसने 10 दिसम्बर,1710 ई० को लोहगढ़ के किले पर आक्रमण कर दिया। उसे देखकर अन्य मुगल सरदारों ने भी किले पर धावा बोल दिया। सिक्खों ने शत्रु का डट कर सामना किया, परन्तु किले में खाद्य-सामग्री की कमी के कारण सिक्खों को काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अंत में बंदा सिंह बहादुर अपने सिक्खों सहित नाहन की पहाड़ियों की ओर निकल गया। ___ 11 दिसम्बर, 1710 ई० को मुनीम खान ने फिर से किले पर धावा बोल दिया और किले पर अधिकार कर लिया। अत: बहादुर शाह ने बंदा सिंह बहादुर का पीछा करने के लिए हमीद खान को नाहन की ओर भेजा। वह स्वयं सढौरा, बडौली, रोपड़, होशियारपुर, कलानौर आदि स्थानों से होता हुआ लाहौर जा पहुँचा।

4. पहाड़ी प्रदेश में बंदा सिंह बहादुर की गतिविधियां- पहाड़ों में जाकर बंदा सिंह बहादुर ने सिक्खों के नाम हुक्मनामा भेजे। थोड़े समय में ही एक बड़ी संख्या में सिक्ख कीरतपुर में एकत्रित हो गए।

  1. सबसे पहले बंदा सिंह बहादुर ने गुरु गोबिन्द सिंह जी के पुराने शत्रु बिलासपुर के शासक भीमचन्द को एक ‘परवाना’ भेजा और उसे अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा। उसके न करने पर बंदा ने बिलासपुर पर आक्रमण कर दिया। एक घमासान युद्ध हुआ जिसमें भीमचन्द तथा 1300 सैनिक मारे गए। सिक्खों को शानदार विजय प्राप्त हुई।
  2. बंदा सिंह बहादुर की विजय से शेष पहाड़ी राजा भयभीत हो गए। उनमें से कइयों ने बंदा सिंह बहादुर को नज़राना देना स्वीकार कर लिया। मण्डी के राजा सिद्ध सेन ने यह घोषणा कर दी कि वह सिक्ख गुरु साहिबान का अनुयायी है।
  3. मण्डी से बंदा सिंह बहादुर कुल्लू की ओर बढ़ा। वहाँ के शासक मान सिंह ने चालाकी से उसे कैद कर लिया, परन्तु जल्दी ही बंदा सिंह बहादुर वहां से बच निकलने में सफल हो गया।
  4. कुल्लू से बंदा सिंह बहादुर चम्बा रियासत की ओर बढ़ा। वहाँ के राजा उदय सिंह ने उसका हार्दिक स्वागत किया। उसने अपने परिवार में से एक लड़की का विवाह भी उसके साथ कर दिया। 1711 ई० के अन्त में बंदा के यहाँ एक पुत्र पैदा हुआ। उसका नाम अजय सिंह रखा गया।
  5. बहिरामपुर की लड़ाई-अब बंदा सिंह बहादुर रायपुर तथा बहिरामपुर के पहाड़ों से निकल कर मैदानी प्रदेश में आ गया। वहां जम्मू के फ़ौजदार बायजीद खां खेशगी ने उस पर आक्रमण कर दिया। 4 जून, 1711 ई० को बहिरामपुर के निकट लड़ाई हुई। इस लड़ाई में बाज़ सिंह तथा फतेह सिंह ने अपनी वीरता के जौहर दिखाए और सिक्खों को विजय दिलाई।बहिरामपुर की विजय के पश्चात् बंदा सिंह बहादुर ने रायपुर, कलानौर तथा बटाला पर आक्रमण किए और इन स्थानों को अपने अधिकार में ले लिया, परन्तु उसकी ये विजयें चिर-स्थायी सिद्ध न हुईं। उसने फिर से पहाड़ों में शरण ली। परन्तु बहादुर शाह के अधीन मुग़ल सरकार उसकी शक्ति को कुचलने में असफल रही।


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