1.

भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के योगदान पर प्रकाश डालिए। उसका क्या परिणाम हुआ ?याभारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सुभाषचन्द्र बोस तथा उनळी आजाद हिन्द फौज की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।यासुभाषचन्द्र बोस पर टिप्पणी लिखिए।याभारत के स्वाधीनता आन्दोलन में सुभाषचन्द्र बोस के योगदान की विवेचना कीजिए।

Answer»

सुभाषचन्द्र बोस को जन्म 23 जनवरी, 1897 ई० में कटक में हुआ था। वे जन्मजात क्रान्तिकारी थे। भारत के स्वतन्त्रता के इतिहास में सुभाषचन्द्र बोस का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी आई०सी०एस० की नौकरी को छोड़कर सुभाष राष्ट्रीय आन्दोलन में कूद पड़े। असहयोग आन्दोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने गांधी जी को पूरा सहयोग दिया। प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार आन्दोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिस कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें दिसम्बर, 1921 ई० में 6 महीने के लिए जेल भेज दिया।

जब गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया तो सुभाषचन्द्र बोस को बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने गांधी जी का साथ छोड़ दिया। इसके बाद वे स्वराज्य पार्टी की स्थापना के कार्य में लग गये। सन् 1924 ई० में सरकार ने उन पर क्रान्तिकारी षड्यन्त्र का आरोप लगाकर उन्हें बन्दी बना लिया। सन् 1929 ई० में उन्हें रिहा कर दिया गया। सन् 1929 ई० में जब कांग्रेस ने अपना उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य घोषित किया तो वे फिर से कांग्रेस में सम्मिलित हो गये।

सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस की उदारवादी नीति से बहुत असन्तुष्ट थे, क्योंकि वे सशस्त्र क्रान्ति के पक्ष में थे। इस बीच वे बीमार पड़ गये और इलाज के लिए यूरोप चले गये। सन् 1936 ई० में भारत लौटने पर उन्होंने पुनः स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। सन् 1938 ई० में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये, किन्तु कुछ , समय पश्चात् कांग्रेस से अलग हो गये और ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक एक नया संगठन बनाया।

ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें सरकार विरोधी होने का आरोप लगाकर जेल भेजा गया तथा बाद में घर पर ही नजरबन्द कर दिया गया। सन् 1941 ई० में सुभाष ब्रिटिश सरकार को चकमा देकर भारत से बाहर चले गय और अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुँच गये। जापानी सहायता से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए फरवरी, 1943 ई० में वे जापान पहुँचे। जापानी सरकार की सहायता से उन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ को गठन किया और अपने अनुयायियों को जयहिन्द’ का नारा दिया। भारत को स्वतन्त्रता दिलाने हेतु उनकी सेना ने उत्तर-पूर्व की ओर से भारत पर आक्रमण कर दिया। आजाद हिन्द फौज आगे बढ़ती हुई असम तक आ पहुँची, किन्तु उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान हार गया। इसके परिणामस्वरूप आजाद हिन्द फौज को जापान से सहायता मिलनी बन्द हो गयी और उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। उन्हीं दिनों एक वायुयान दुर्घटना में सुभाष जी की मृत्यु हो गयी।

परिणाम डॉ० वी०पी० वर्मा के अनुसार, “एक राजनीतिक कार्यकर्ता तथा नेता के रूप में बोस ओजस्वी राष्ट्रवाद के समर्थक थे। देशभक्ति उनके व्यक्तित्व का सार तथा उनकी आत्मा की उच्चतम अभिव्यक्ति थी। ऐसे राष्ट्रवादी नेता के संघर्ष का परिणाम उत्साहवर्धक ही होना था।

उनके द्वारा गठित आजाद हिन्द फौज का नारा–“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”- युवाओं में स्वाधीनता की भावना तीव्र करने में मील का पत्थर साबित हुआ। सुभाषचन्द्र बोस क्रान्तिकारी और राष्ट्रवादी नेता थे। उनके प्रयासों से भारतीयों में राजनीतिक चेतना तीव्रतम रूप में अभिव्यक्त हुई। वे इतने अच्छे वक्ता थे कि जो भी उनको सुनता राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत हो पक्का देशभक्त बन जाता।

सुभाषचन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज का भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत की आजादी के लिए उन्होंने जो बलिदान किये उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।



Discussion

No Comment Found