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भारत में अल्पसंख्यकों अर्थात् अल्पसंख्यक वर्गों की कुछ समस्याओं पर प्रकाश डालिए।

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भारत एक विभिन्नताओं वाला देश है। इस देश में विभिन्न प्रकार की भूमि, विभिन्न प्रकार की जलवायु, विभिन्न धर्म, विभिन्न जातियाँ, विभिन्न भाषाएँ एवं विभिन्न प्रकार के रीतिरिवाज पाये जाते हैं। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि यहाँ के लोग विभिन्न आधारों पर अनेक समूहों में विभाजित रहते हैं। यह विभाजन धर्म, सम्प्रदाय, जाति, व्यवसाय, आयु, लिंग, शिक्षा आदि किसी भी आधार पर हो सकता है। इन सभी समूहों की सदस्य संख्या समान नहीं है। किसी समूह में अधिक लोग रहते हैं और किसी में सदस्यों की संख्या बहुत कम होती है।
इस प्रकार किसी विशेष आधार पर बने सामाजिक समूहों में, जिनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है, उन्हें हम अल्पसंख्यक समूह अथवा अल्पसंख्यक (Minorities) कहते हैं। भारत में मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, बौद्ध, जैन, पारसी आदि धर्मावलम्बियों तथा जनजातियों को अल्पसंख्यकों की श्रेणी में रखा जाता है। भारतीय समाज में पाया जाने वाला सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह मुस्लिम है। दूसरा प्रमुख अल्पसंख्यक सम्प्रदाय ईसाइयों का है। सिक्खों का भी अल्पसंख्यक वर्गों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके अतिरिक्त बौद्ध, जैन, पारसी एवं जनजातियाँ अन्य अल्पसंख्यक समूह हैं।
अल्पसंख्यकों की समस्या

भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक समूहों की अनेक समस्याएँ हैं। यद्यपि संविधान द्वारा अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार दिया गया है, किन्तु संविधान में तथा प्रचलित कानूनों में उपलब्ध संरक्षणों के बावजूद भी अल्पसंख्यकों में यह भावना बनी हुई है कि उनके साथ समानता का व्यवहार नहीं किया जाता। यहाँ हम भारत के प्रमुख अल्पसंख्यकों की कुछ प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश डालेंगे

1. मुसलमानों की समस्याएँ – समकालीन भारत में मुसलमानों की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं

⦁     यद्यपि संविधान में कहा गया है कि धार्मिक आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता, किन्तु सामान्य मुसलमान स्वयं को मानसिक दृष्टि से असुरक्षित समझता है।
⦁    मुस्लिम समुदाय का अधिकांश भाग अपने रूढ़िवादी विचारों के कारण अशिक्षित रह गया है जिसके कारण उन्हें विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अशिक्षी एवं रूढ़िवादिता के कारण उन्हें आर्थिक विकास के पूर्ण अवसर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। आमतौर पर वे परम्परागत व्यवसायों को ही अपनाते हैं तथा सरकारी नौकरियों व श्वेतवसन व्यवसायों में नहीं जा पाते।।
⦁     मुस्लिम समाज सांस्कृतिक दृष्टि से भी स्वयं को बहुसंख्यक वर्गों से भिन्न समझता है। उनकी यह भावना पृथकता के भाव को प्रोत्साहित करती है।
⦁    स्वाधीन भारत का मुस्लिम सम्प्रदाय राजनीतिक दृष्टि से दिशाहीन प्रतीत होता है। योग्य मुस्लिम नेतृत्व का अभाव दिखायी देता है। जिन नेताओं ने स्वयं को राजनीतिक मंच पर प्रतिष्ठित किया है, वे कठिनता से ही मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।

2. ईसाइयों की समस्याएँ – ईसाइयों की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं

⦁     ईसाइयों का रहन-सहन, मौज-मस्ती को होता है। यह प्रवृत्ति उनमें ऋणग्रस्तता को जन्म देती है।
⦁     यद्यपि ईसाई लोग स्वयं को अंग्रेजों से सम्बन्धित मानते हैं, किन्तु वे किसी निश्चित जीवन शैली (अंग्रेजी अथवा भारतीय) को नहीं अपना पाते। एक से उनका लगाव नहीं है, तो दूसरा उनके लिए सम्भव नहीं है।
⦁     चूंकि ईसाइयों में विवाह-विच्छेद (Divorce) एक आम-बात है, इसलिए इसका बुरा प्रभाव स्त्रियों की स्थिति और आश्रितों पर पड़ता है।

3. सिक्खों की समस्याएँ – सिक्खों की प्रमुख समस्याएँ निम्न प्रकार हैं

⦁    सिक्खों का एक वर्ग अधिक सम्पन्न है, तो दूसरा वर्ग दरिद्र भी है।
⦁     सिक्खों के साथ भारत के अन्य भागों के लोग अन्त:क्रिया के पक्ष में नहीं हैं।
⦁     सिक्खों के एक वर्ग द्वारा धर्म को राजनीति से जोड़ने का प्रयत्न किया गया है। अतः
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती धर्म को राजनीति से पृथक् करने की है।



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