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भारत में देशी राज्यों ( रजवाड़ों) के विलय पर एक निबन्ध लिखिए।

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राज्यों के पुनर्गठन की समस्या-राज्यों का गठन तथा पुनः संगठन स्वतन्त्र भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी। उस समय भारतवर्ष छोटी-छोटी रियासतों में बँटा हुआ था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पहले भारत दो भागों में बँटा हुआ था-
(i) ब्रिटिश भारत,
(ii) देसी राज्य (रजवाड़े)।

ब्रिटिश भारत का शासन तत्कालीन भारत सरकार के अधीन था, जबकि देसी राज्यों का शासन देसी राजाओं के हाथों में था। राजाओं ने ब्रिटिश राज की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार कर रखी थी और इसमें वे अपने राज्य के घरेलू मामलों का शासन चलाते थे। अंग्रेजी प्रभुत्व में आने वाले भारतीय साम्राज्य के एक-तिहाई हिस्से में रजवाड़े कायम थे। प्रत्येक चार भारतीयों में से एक किसी-न-किसी रजवाड़े की प्रजा थी।

देसी राज्यों या रजवाड़ों के विलय की समस्या-स्वतन्त्रता के तुरन्त पहले ब्रिटिश-शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश-अधीनता से स्वतन्त्र हो जाएँगे। रजवाड़ों की कुल संख्या लगभग 565 थी। ब्रिटिश शासन का यह दृष्टिकोण था कि रजवाड़े अपनी मर्जी से चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाएँ या फिर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखें। यह फैसला रजवाड़ों की प्रजा को नहीं करना था बल्कि यह फैसला लेने का अधिकार राजाओं को दिया गया था। यह एक गम्भीर समस्या थी और इससे अखण्ड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडरा रहा था।

अनेक राजाओं ने अपने राज्य को आजाद रखने की घोषणा भी कर दी थी। रजवाड़ों के शासकों के रवैये से यह बात साफ हो गई कि स्वतन्त्रता के बाद भारत कई छोटे-छोटे देशों की शक्ल में बँट जाने वाला है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का लक्ष्य एकता और आत्मनिर्णय के साथ-साथ लोकतन्त्र का रास्ता अपनाना था जबकि रजवाड़ों में शासन अलोकतान्त्रिक रीति से चलाया जाता था और शासक अपनी प्रजा को लोकतान्त्रिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे।

राज्यों के पुनर्गठन की समस्या का समाधान-यद्यपि देसी रियासतों की भारत में विलय की समस्या एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी, परन्तु पं० नेहरू, तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल ने इस समस्या को बड़े ही सुनियोजित ढंग से सुलझाया। देसी रियासतों की समस्या के हल के लिए पं० नेहरू ने 27 जून, 1947 को एक विभाग की स्थापना की, जिसे राज्य विभाग कहा जाता है। पं० नेहरू ने सरदार पटेल को इस विभाग का मन्त्री एवं वी० पी० मेनन को इसका सचिव नियुक्त किया। देसी रियासतों का विलय तीन चरणों में किया गया-

(i) प्रथम चरण-एकीकरण,
(ii) द्वितीय चरण-अधिमिलन एवं
(iii) तृतीय चरण-प्रजातन्त्रीकरण।
(i) प्रथम चरण : एकीकरण-एकीकरण में वे देसी रियासतें आती हैं, जिन्होंने सरदार पटेल के परामर्श पर स्वयं ही भारत में विलय होना स्वीकार कर लिया था। अधिकांश देसी रियासतों के शासकों ने भारतीय संघ में अपने विलय के एक सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसे ‘इन्स्ट्रमेण्ट ऑफ एक्सेशन’ कहा जाता है। इस पर हस्ताक्षर का अर्थ था कि रजवाड़े भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमत हैं।
(ii) द्वितीय चरण : अधिमिलन-अधिमिलन में मणिपुर, जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसी रियासतों को शामिल किया गया, जबकि इन्होंने स्वेच्छा से भारत में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था, परन्तु सरदार पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल एवं सूझ-बूझ से इन रियासतों को भारत में विलय होने के लिए मजबूर कर दिया।
(iii) तृतीय चरण : प्रजातन्त्रीकरण-तृतीय चरण प्रजातन्त्रीकरण से सम्बन्धित था। देसी रियासतों को प्रजातान्त्रिक ढाँचे में ढालना भारत सरकार के लिए प्रमुख समस्या थी। इस समस्या के लिए प्रान्तों में प्रजातान्त्रिक एवं प्रतिनिधिक संस्थाओं की स्थापना की गई। इन प्रान्तों में भी संसदीय शासन प्रणाली लागू की गई तथा निर्वाचित विधानसभाओं की व्यवस्था की गई।

इस तरह पं० नेहरू एवं सरदार पटेल की सूझ-बूझ से देशी रियासतों की समस्या का समाधान किया गया।



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