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Answer» जनजातीय जनसंख्या निवास आज जनजातियाँ भारत की समस्त जनसंख्या का लगभग 8 प्रतिशत हैं। भारतीय संविधान में 560 जनजातियों का उल्लेख है, जो विभिन्न राज्यों के ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में रहती हैं। भारतीय संघ के कुछ राज्यों में जनजाति जनसंख्या अधिक है और कुछ राज्यों में कम। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में जनजातीय जनसंख्या सर्वाधिक है। इसके बाद ओडिशा, बिहार, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, पं० बंगाल, आन्ध्र प्रदेश तथा असम राज्य आते हैं। उत्तराखण्ड, केरल एवं तमिलनाडु में जनजाति जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है। प्रतिशत की दृष्टि से मणिपुर, मेघालय, नागालैण्डे, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम ऐसे राज्य हैं, जिनकी समस्त जनसंख्या में जनजाति जनसंख्या अनुपात 20 प्रतिशत से अधिक है। सरकार की ओर से किए जा रहे उपाय आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान के कुछ क्षेत्र अनुच्छेद 244 और संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अन्तर्गत ‘अनुसूचित क्षेत्र (Scheduled Areas) घोषित किये गये हैं। इन राज्यों के राज्यपाल अनुसूचित क्षेत्रों की रिपोर्ट प्रतिवर्ष राष्ट्रपति को देते हैं। असम, मेघालय और मिजोरम का प्रशासन संविधान की छठी अनुसूची के उपबन्धों के आधार पर किया जाता है। इसे अनुसूची के अनुसार उन्हें स्वायत्तशासी’ (Autonomous) जिलों में बाँटा गया है। इस प्रकार के 8 जिले हैं-असम के उत्तरी कछार, पहाड़ी जिले तथा मिकिर पहाड़ी जिले, मेघालय के संयुक्त खासी जयन्तिया, जोवाई और गारो पहाड़ी जिले तथा मिजोरम के चकमा, लाखेर और पावी जिले। प्रत्येक स्वायत्तशासी जिले में एक जिला परिषद् होती है जिसमें अधिकतम 30 सदस्य होते हैं। इनमें चार मनोनीत हो सकते हैं और शेष का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाता है। इस परिषद् को कुछ प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक अधिकार प्रदान किये गये हैं। जनजातियों के कल्याण हेतु दो राज्यों की स्थापना – वर्ष 2000 ई० में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों का विभाजन कर क्रमश: छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और झारखण्ड की स्थापना की गई है। इनमें से छत्तीसगढ़ और झारखण्ड राज्य की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य इन क्षेत्रों में रहने वाली जनजातियों का विकास ही रहा है। पृथक जनजाति राष्ट्रीय आयोग की स्थापना – अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के विकास हेतु 65वें संवैधानिक संशोधन (1990) के द्वारा अनुसूचित जाति एवं जनजाति राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की गयी थी, लेकिन कुछ ही वर्ष बाद यह अनुभव किया गया कि भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से जनजातियाँ अनुसूचित जातियों से भिन्न हैं तथा उनकी समस्याएँ भी भिन्न हैं। अतः 85वें संवैधानिक संशोधन (2003) ई० के आधार पर वर्ष 1990 में स्थापित आयोग के स्थान पर पृथक् ‘जनजाति राष्ट्रीय आयोग’ स्थापित किया गया है। इस प्रकार के आयोग की स्थापना सही दिशा में एक कदम है।
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