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भारत में जनसंख्या-वृद्धि के कारणों एवं जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के उपाय बताइए।या“भारत में जनसंख्या की समस्या विस्फोटक है।” विवेचना कीजिए। इसे हल करने के लिए आप क्या सुझाव देंगे? याभारत में जनाधिक्य की समस्या हल करने के लिए सुझाव दीजिए।

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भारत में तीव्र गति से जनसंख्या वृद्धि के कारण निम्नलिखित हैं
1. जन्म-दर एवं मृत्यु-दर के मध्य अन्तराल का बढ़ना – भारत में 1921 ई० से पूर्व तक जन्म-दर तथा मृत्यु-दर के बीच का अन्तर बहुत कम रहा। 1921 ई० के बाद से यह अन्तर बढ़ने लगा। पिछले तीस वर्षों से जन्म-दर जिस गति से घटी है उसकी अपेक्षा मृत्यु-दर कहीं अधिक घटी है, जिससे दोनों दरों में अन्तर बढ़ गया है। स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ जाने के कारण मृत्यु-देर में कमी आयी। 1921 ई० में जन्म-दर 46.4 प्रति हजार थी और मृत्यु-दर 36.3 प्रति हजार; जबकि 2011 ई० में जन्म-दर 23 प्रति हजार तथा मृत्यु-दर 9 प्रति हजार है। इससे स्पष्ट हो कि मृत्यु-दर में तेजी से कमी हुई है।
2. विवाह की औसत आयु – जन्म का सीधा सम्बन्ध विवाह से होता है। भारत में लड़कियों का विवाह कम आयु में हो जाया करता है, जिससे वे कम आयु में ही माँ बन जाती हैं। शारदा ऐक्ट के द्वारा लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष थी, जो अब 18 वर्ष कर दी गयी है। विकसित देशों में लड़कियों के विवाह की औसत आयु 22-25 वर्ष है।
3. प्रजनन दर – विकसित देशों की अपेक्षा भारत में प्रजनन दर ऊँची है जिसका मुख्य कारण विवाह की अनिवार्यता, न्यूनतम आयु का कम होना, गर्भ निरोधक उपायों का सीमित उपयोग, साक्षरता में कमी, जीवन-स्तर की निम्नता, परम्परागत जीवन-दर्शन तथा 80% जनसंख्या का ग्रामीण होना है। कर्म आयु में विवाहित स्त्री कम आयु में ही माँ बन जाती है। इस प्रकार अपनी जीवन-अवधि में एक स्त्री 6 से 7 बच्चों तक की माँ बन जाती है। विकसित देशों में यह संख्या 2 से 3 तक ही है।
4. प्रचलित अन्धविश्वास – वंश चलाने एवं श्राद्ध कर्म हेतु पुत्र की कामना करना तथा अन्य धार्मिक अन्धविश्वासों के कारण परिवार में बच्चों की संख्या अधिक हो जाती है।
5. वृद्धावस्था की सुरक्षा – वृद्धावस्था में सन्तान उनकी देख-रेख करेगी; यह धारणा भी जनसंख्या वृद्धि में सहायक होती है।
6. ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े परिवारों का होना – भारत कृषि-प्रधान देश है। बड़ा परिवार कृषि के कामों में बाधक न होकर सहायक सिद्ध होता है। ग्रामीण स्त्रियों के कार्य इस प्रकार के होते हैं कि कार्य करने के साथ-साथ वे बच्चों की देख-रेख भी कर लेती हैं। इसी से अधिक बच्चों को जन्म देना उन्हें बाधक प्रतीत नहीं होता है।
7. अधिकांश लोगों का घर पर रहना – भारत में समस्त जनसंख्या का केवल 33% कार्यशील है। कुल कार्यशील जनसंख्या का लगभग 70% कृषि एवं सम्बन्धित कार्यों में संलग्न होने के कारण अधिकांश लोग घर पर ही रहते हैं, जिसके कारण जनसंख्या में वृद्धि होती है।
8. शरणार्थियों का आगमन – देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से आने वाले लाखों-करोड़ों शरणार्थियों के कारण भी देश में जनसंख्या में वृद्धि हुई है।
9. परिवार नियोजन के प्रति अज्ञानता – ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के अशिक्षित होने के कारण परिवार के आकार के सम्बन्ध में उदासीनता पायी जाती है। परिणामस्वरूप परिवार नियोजन के साधन देश में लोकप्रिय नहीं हो पा रहे हैं। परिवार नियोजन के उपायों के प्रति संकोच, लज्जा तथा निराधार शंकाओं के कारण दम्पती बच्चों को जन्म देते रहते हैं।

जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के उपाय
जनसंख्या की समस्या के समाधान के लिए हमें एक साथ कई उपाय करने पड़ेंगे। जन्म-दर को कम करने के लिए तत्कालीन एवं दीर्घकालीन उपाय किये जाने चाहिए। तत्कालीन उपायों में निरोध, नसबन्दी, लूप, ऑपरेशन आदि के लिए लोगों को प्रेरित करना तथा दीर्घकालीन उपायों में विवाह की न्यूनतम आयु में वृद्धि, बाल-विवाह पर रोक, मनोरंजन के साधनों में वृद्धि, आत्म-संयम वे ब्रह्मचर्य के पालन के लिए लोगों को प्रेरित करना आदि हैं। इन उपायों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है
1. जन्म-दर में कमी करना – जनसंख्या-वृद्धि को सीमित करने के लिए यह आवश्यक है कि मृत्यु-दरे के साथ-साथ जन्म-दर में भी गिरावट लायी जाए। वर्ष 1951-60 में जन्म-दर 41.7% थी, जो 2011 ई० में 23% हो गयी। जन्म-दर में और अधिक कमी लायी जानी चाहिए।
2. साक्षरता तथा शिक्षा का प्रसार आवश्यक – शिक्षा के माध्यम से ही जन-साधारण में जनसंख्या-वृद्धि के विषय में जागरूकता लायी जा सकेगी। विकसित देशों में जनसंख्या-वृद्धि की समस्या न होने का प्रमुख कारण उनकी शत-प्रतिशत साक्षरता है। भारत में केवल केरल में ही साक्षरता अन्य प्रदेशों की अपेक्षा अधिक है।
3. स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल – जनसंख्या-वृद्धि के परिप्रेक्ष्य में स्त्री-शिक्षा का विशेष महत्त्व है। केरल में स्त्रियों की साक्षरता प्रतिशत 91.98 है, जबकि उत्तर प्रदेश में 59.26 है। इसी कारण से उत्तर प्रदेश में जनसंख्या वृद्धि की दर भी उच्च है। अत: जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण हेतु स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल देने की आवश्यकता है।
4. विवाह सम्बन्धी कानूनों का सख्ती से पालन – यद्यपि विवाह की न्यूनतम आयु कानूनी तौर पर निर्धारित है। बाल-विवाह वर्जित है, फिर भी ये बुराइयाँ समाज में यथावत् बनी हुई हैं। इनका सख्ती से पालन किया जाना भी आवश्यक है। इस प्रकार जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाया जा सकता है।
5. मनोरंजन के साधनों में वृद्धि – विशेष रूप से ग्रामीण तथा पिछड़े क्षेत्रों में मनोरंजन के साधनों में वृद्धि की जानी चाहिए। इनमें सिनेमा, सार्वजनिक दूरदर्शन की व्यवस्था, शिक्षाप्रद छोटी-छोटी फिल्मों का प्रदर्शन, अखाड़े, खेल-कूद प्रतियोगिताएँ आदि मुख्य हैं। मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होने से जनसंख्या-वृद्धि पर भी नियन्त्रण लगेगा।
6. आत्म-संयम/नैतिक शिक्षा का प्रसार – नैतिकतापूर्ण संयमित जीवन जनसंख्या को सीमित रखने का आदर्श उपाय है। अत: इस बात को समुचित प्रचार किया जाना चाहिए कि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य अच्छी कार्यक्षमता, सुखद पारिवारिक जीवन तथा देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए संयमी जीवन बिताना उपयोगी है। इससे न केवल जन्म-दर कम होगी, वरन् अनेक सामाजिक समस्याओं; जैसे–चोरी, डकैती, व्यभिचार आदि; में भी कमी आएगी।
7. परिवार नियोजन का प्रचार तथा सम्बद्ध सुविधाओं को उपलब्ध कराना – परिवार तथा देश के कल्याण के लिए परिवार नियोजन के महत्त्व को देखते हुए 1977 ई० से इसे परिवार-कल्याण का नाम दिया गया है। परिवार-कल्याण के द्वारा दम्पति अपने बच्चों की संख्या सीमित रखने तथा दो बच्चों के जन्म के मध्य पर्याप्त समयान्तर रखते हैं। ग्रामीण जनता तक परिवार कल्याण कार्यक्रमों का लाभ पहुंचाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार नियोजन का प्रचार तथा सुविधाओं को उपलब्ध कराने की अधिक आवश्यकता है। परिवार कल्याण कार्यक्रम को ‘जन-अभियान’ बनाया जाना चाहिए।
8. विज्ञापन व संवहन/संचार के साधनों का उपयोग – जनसंख्या वृद्धि के कारणों, परिणामों एवं जनसंख्या को नियन्त्रित करने के उपायों का विज्ञापन एवं प्रचार रेडियो, दूरदर्शन व चलचित्रों के माध्यम से ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों में करने की आवश्यकता है। इसके माध्यम से भी जनसंख्या को सीमित करने में सहायता मिलेगी।
9. सीमित परिवारों को पुरस्कृत करना – जिन दम्पतियों के एक या दो ही बच्चे हैं, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इससे अन्य व्यक्तियों को भी सीमित परिवार की प्रेरणा मिलेगी।
10. जनमानस में जनसंख्या के प्रति अनुकूल चेतना का विकास करना – जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए हमें जनमानस में अनुकूल चेतना का विकास करना होगा, जिससे आज के बालक-बालिकाएँ जो कल वयस्क नागरिक बनेंगे, वे यह निर्णय करने में सक्षम हो सकें कि उनके परिवार का आकार क्या होना चाहिए।
संक्षेप में, देश के तरुण वर्ग को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जनसंख्या-वृद्धि की समस्या का हल उनके अपने ही हाथों में है। जागरूक एवं सक्रिय बनकर ही वे अपने वर्तमान और भविष्य को सुखद बना सकते हैं। जन-जन में जनसंख्या के प्रति अनुकूल चेतना का विकास होने पर ही हम जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण पाने में सफल हो सकते हैं।



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