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भारत में निर्देशन की समस्याओं का वर्णन कीजिए।

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वर्तमान औद्योगिक एवं नगरीय जीवन में विभिन्न प्रकार के निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है। निर्देशन की व्यापक व्यवस्था को अनिवार्य माना जा रहा है तथा इसके लिए बहुपक्षीय प्रयास भी किये जा रहे हैं, परन्तु जन-साधारण निर्देशन सेवाओं से समुचित लाभ प्राप्त नहीं कर पा रहा। वास्तव में निर्देशन-क्षेत्र में कुछ समस्याएँ प्रबल हो रही हैं जिनके कारण अंभीष्ट परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे। इस क्षेत्र की कुछ मुख्य समस्याओं का विवरण निम्नवर्णित है –

⦁    हमारे विद्यालय में कुछ शिक्षकों का दृष्टिकोण पारम्परिक तथा रूढ़िवादी है। इस वर्ग के शिक्षक केवल पारम्परिक ढंग से शिक्षण कार्य ही करते हैं। वे आवश्यक परामर्श एवं निर्देशन की गतिविधियों को कोई महत्त्व नहीं देते।
⦁    विभिन्न कारणों से हमारे विद्यालयों में शिक्षा सम्बन्धी आधुनिक साधनों की कमी है। इस स्थिति में निर्देशन के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी यथार्थ में निर्देशन सम्बन्धी समुचित व्यवस्था कर पाना प्रायः सम्भव नहीं होता।
⦁    हमारे विद्यालयों में छात्र संख्या बहुत अधिक है। इस स्थिति में प्रभावशाली एवं उपयोगी निर्देशन की व्यवस्था कर पाना कठिन है।
⦁    सामान्य रूप से सभी शिक्षकों पर कार्यभार काफी अधिक है। उन्हें शिक्षण के अतिरिक्त भी विभिन्न कार्य करने पड़ते हैं। इस स्थिति में वे छात्रों को आवश्यक निर्देशन देने में प्रायः असमर्थ रहते हैं।
⦁    कुछ दृष्टिकोणों से हमारी शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है। हमारी शिक्षा में व्यावसाग्निक पाठ्यक्रमों की समुचित व्यवस्था नहीं है। इस स्थिति में उपर्युक्त निर्देशन की व्यवस्था नहीं हो पा रही।
⦁    हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के क्षेत्र के शोध-कार्यों की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में निर्देशन की उत्तम व्यवस्था कैसे हो सकती है?
⦁    हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के लिए आवश्यक मानक परीक्षणों की समुचित व्यैवस्था नहीं है। इस कमी के कारण भी उत्तम निर्देशन व्यवस्था को कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
⦁    वर्तमान समय में हमारे देश में रोजगार के अवसरों की बहुत कमी है तथा बेरोजगारी का बोलबाला है। ऐसे में सफल एवं उत्तम निर्देशन की व्यवस्था कैसे हो सकती है?



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