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भारत में राष्ट्रीयता के उदय के कारणों पर प्रकाश डालिए।यासन् 1857 ई० से 1885 ई० के मध्य भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।याभारत में राष्ट्रीय जागृति के उद्भव के उत्तरदायी कारणों की विवेचना कीजिए।याराष्ट्रीय जागरण के तीन सामाजिक तथा तीन राजनैतिक कारण लिखिएयाउन्नीसवीं शताब्दी में भारत में राजनीतिक चेतना के विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।

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उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का तेजी से विकास हुआ, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

1. अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण – पहले ईस्ट इण्डिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश शासन ने भारतीय लोगों का भरपूर आर्थिक शोषण किया। दोषपूर्ण भूमि-कर व्यवस्था के कारण किसानों को अपनी भूमि-सम्पत्ति से वंचित होना पड़ा। नव-जमींदार र्ग कृषित भूमि का वास्तविक स्वामी बन बैठा। अकाल आदि प्राकृतिक प्रकोपों ने निर्धन जनता पर अत्यधिक बोझ डाल दिया। दस्तकार तथा शिल्पकार बेरोजगार हो गये। उद्योगपति और व्यापारी वर्ग को भी आर्थिक क्षति हुई। इन भयंकर परिस्थितियों में लोगों में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हुआ। वे ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ने के लिए कृतसंकल्प हो गये।

2. देश को प्रशासनिक एकीकरण – अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए देश को राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधा। इससे भारत एक राष्ट्र के रूप में उदित हुआ। देश की जनता में अंग्रेजों के प्रशासन तथा शोषण के विरुद्ध एके राष्ट्रीय दृष्टिकोण का उदय तथा विकास हुआ।

3. पाश्चात्य चिन्तन तथा शिक्षा – पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से भारतीय लोग पाश्चात्य चिन्तन से | परिचित हुए, जिससे लोगों में राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ। पाश्चात्य दार्शनिकों, विचारकों तथा लेखकों के विचारों ने भारतीयों में स्वतन्त्रता, समानता, लोकतन्त्र तथा देशभक्ति की भावनाओं का संचार किया।

4. सांस्कृतिक विरासत – अपने अतीत का पुनरीक्षण करके कुछ भारतीयों में अपनी पुरातन सांस्कृतिक विरासत से गर्व तथा त्य-सन्तोष को अन्डी भावना जाग्रत हुई। इस भावना के कारण कुछ ले नवीन विचारधाराओं तथा प्रवृत्ति से विमुख अवश्य हुए, किन्तु साथ ही विदेशियों से स्वयं को मुक्त करने का उत्साह भी उनमें जागा।

5. सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन – राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, सैयद अहमद खाँ आदि हिन्दू तथा मुस्लिम समाज-सुधारकों ने अनेक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन चलाये। इन आन्दोलनों से भारतीय लोगों में नवजीवन का संचार हुआ, उनमें सामाजिक तथा राजनीतिक चेतना जागी।

6. जातीय भेदभाव तथा ईसाई धर्म में अन्तरण – अंग्रेजों ने जातिभेद की नीति अपनायी तथा भारतीय लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए अनेक प्रलोभन दिये। इस जबरदस्ती धर्मान्तरण के कारण भारतीयों के | हृदय में क्षोभ तथा अपमान की भावनाएँ पैदा हुईं। परिणामस्वरूप वे अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध जाग्रतहुए।

7. ब्रिटिश प्रशासनलॉर्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी शासनकाल में वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट, आर्स ऐक्ट आदि नये विनियमों ने भारतीयों के हृदय में अंग्रेजों के शासन के प्रति रोष पैदा किया। लॉर्ड रिपन के काल में इल्बर्ट बिल के विरुद्ध यूरोपीय लोगों की जातीय कटुता को देख भारतीय लोग चकित रह गये। इन अनुभवों ने भारतीयों को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होकर आन्दोलन के लिए तैयार किया।

8. प्रेस की भूमिका – उन्नीसवीं शताब्दी में अमृत बाजार पत्रिका, केसरी, हिन्द, ट्रिब्यून आदि समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने जनता में राष्ट्रवादी विचारधारा को फैलाने में बहुत योगदान दिया। प्रेस ने अंग्रेजों की अन्याय तथा भेदभावपूर्ण नीतियों का खण्डन करके भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। तिलक ने ‘केसरी’ के माध्यम से लोगों में अथाह धैर्य और साहस का संचार किया। देश के विभिन्न भागों के नेताओं तथा लोगों को परस्पर एक सूत्र में बाँधते हुए प्रेस ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को गति दी।

9. अन्तर्राष्ट्रीय जागरण का प्रभाव – विश्व के अनेक देशों में स्वतन्त्रता के लिए संग्राम हुए और वे स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफल भी हुए। इन सभी अन्तर्राष्ट्रीय जागरण की घटनाओं से भारतीयों में भी राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।

10. भारतीयों के साथ भेदभाव – भारतीयों को अंग्रेजों के समान अधिकार प्रदान नहीं किये गये थे। राज्यों के उच्च पदों पर भारतीयों को अनेक आधारों पर अयोग्य बताते हुए नियुक्त नहीं किया जाता था। ऐसी सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ 1869 ई० में और अरविन्द घोष के साथ 1877 ई० में हुआ। भारतीयों के साथ इस प्रकार का भेदभाव अपनाये जाने से बुद्धिजीवी वर्ग में अत्यधिक असन्तोष पैदा हुआ और वे राष्ट्रीय जागरण के कार्य में लग गये।



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