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भारत में स्त्री-शिक्षा की मुख्य समस्याओं का उल्लेख कीजिए।याभारत में बालिकाओं की शिक्षा की मुख्य समस्याएँ क्या हैं? इन्हें कैसे दूर किया जा सकता है? याबालिकाओं की शिक्षा के प्रसार में आने वाली कठिनाइयाँ बताइए। इनके समाधान हेतु सुझाव दीजिए।यास्त्री शिक्षा का क्या महत्त्व है? स्त्री-शिक्षा के विकास में क्या-क्या समस्याएँ हैं?याभारत में स्त्री-शिक्षा प्रसार में आने वाली बाधाओं का उल्लेख कीजिए। 

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स्त्री-शिक्षा का महत्त्व
समाज तथा घर में स्त्री का स्थान महत्त्वपूर्ण होता है। अतः स्त्रियों का शिक्षित होना जरूरी है। आज की बालिका कल की स्त्री है, जिस पर पूरे परिवार का दायित्व होता है। अत: बालिका शिक्षा (स्त्री) भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी बालक की शिक्षा। स्त्री-शिक्षा के महत्त्व का विवरण निम्नलिखित है।

1. पारिवारिक उन्नति :
शिक्षित स्त्री अपने परिवार में विभिन्न मूल्यों का विकास तथा बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दे सकती है।
2. सामाजिक उत्थान :
समाज के सतत् उत्थान के लिए भी शिक्षित नारियों का सहयोग आवश्यक है।
3. सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करना :
सती प्रथा, पर्दा प्रथा, छुआछूत, अन्धविश्वास, दहेज प्रथा आदि को समाप्त करने के लिए स्त्री-शिक्षा आवश्यक है।
4. प्रजातन्त्र को सफल बनाना :
पुरुषों के समान अधिकार एवं कर्तव्य प्राप्त कराने तथा उनके प्रति चेतना जाग्रत कर प्रजातन्त्र को सफल बनाने की दृष्टि से स्त्री-शिक्षा का प्रसार आवश्यक है।

स्त्री-शिक्षा की समस्याएँ
इसमें सन्देह नहीं कि स्वाधीन भारत में स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति हुई है, लेकिन कुछ समस्याएँ तथा कठिनाइयाँ स्त्री-शिक्षा के मार्ग में बाधक बनी हुई हैं। इन समस्याओं/कठिनाइयों/बाधाओं का विवरण निम्नलिखित है।

1. सामाजिक कुप्रथाएँ एवं अन्धविश्वास :
भारतीय समाज अनेक सामाजिक रूढ़ियों एवं अन्धविश्वासों से ग्रस्त है। शिक्षा के अभाव में आज भी अधिकांश लोग प्राचीन परम्पराओं एवं विचारों के कट्टर समर्थक हैं। उनका विचार है कि बालिकाओं को पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्हें विवाह करके पति के घर ही जाना है। वह शिक्षित और स्वच्छन्द बालिकाओं को चरित्रहीन भी समझते हैं। कुछ परिवारों में आज भी बाल-विवाह और परदा-प्रथा विद्यमान है, जिनके कारण स्त्री-शिक्षा के प्रसार में बाधा उत्पन्न हो रही है।
2. जनसाधारण में शिक्षा का कम प्रसार :
आज भी देश की अधिकांश जनता अशिक्षित है और शिक्षा के सामाजिक तथा सांस्कृतिक महत्त्व से अनभिज्ञ है। अधिकांश लोग शिक्षा को निरर्थक और समय का अपव्यय समझते हैं। उनका विचार है कि शिक्षा केवल व्यावसायिक या राजनीतिक लाभ के लिए ही ग्रहण की जाती है। इस दृष्टि से केवल लड़कों को ही शिक्षित करना उचित है।
3. निर्धनता तथा पिछडापन :
वर्तमान समय में भारत की अधिकांश जनता निर्धन है और उसका जीवन-स्तर काफी पिछड़ा हुआ है। हमारे ग्रामीण क्षेत्र आज भी अविकसित दशा में हैं और वहाँ जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ भी सुलभ नहीं हो पाती हैं। धन के अभाव के कारण वे अपने बालकों को ही शिक्षा नहीं दिला पाते हैं, फिर बालिकाओं को विद्यालय भेजना तो एक असम्भव बात है।
4. संकीर्ण दृष्टिकोण :
भारत में लोगों का स्त्रियों के प्रति बहुत संकीर्ण दृष्टिकोण पाया जाता है। अशिक्षा के कारण अधिकांश व्यक्ति यह कहते हैं कि स्त्रियों को केवल घर-गृहस्थी का कार्य भार सँभालना है, इसलिए अधिक पढ़ाने-लिखाने की आवश्यकता नहीं है। शिक्षा प्राप्त करने पर स्त्रियाँ घर के काम नहीं कर सकेंगी। इस प्रकार के संकीर्ण दृष्टिकोण स्त्री-शिक्षा के प्रसार में बाधक सिद्ध हो रहे हैं।
5. बालिका-शिक्षा के प्रति अनुचित दृष्टिकोण :
भारत में अधिकांश लोग अपने बालकों को शिक्षा नौकरी प्राप्त करने के सामाजिक कुप्रथाएँ एवं उद्देश्य से दिलाते हैं और लड़कियों को शिक्षा इसलिए देते हैं, अन्धविश्वास जिससे उनका विवाह अच्छे परिवार में हो जाए। इस अनुचित दृष्टिकोण के कारण विवाह होते ही लड़कियों की पढ़ाई बन्द करा दी जाती है।
6. शिक्षा में अपव्यय :
शिक्षा सम्बन्धी आँकड़ों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बालकों की अपेक्षा बालिकाओं की शिक्षा पर अधिक अपव्यय होता है। वस्तुत: अधिकांश अभिभावक, के पास धनाभाव और पूर्ण सुविधाओं के उपलब्ध न होने के कारण अधिकांश छात्राएँ निर्धारित अवधि से पूर्व ही पढ़ना छोड़ देती हैं। इस कारण अनेक बालिकाएँ समुचित शिक्षा प्राप्त करने से वंचित तथा रह जाती हैं।
7. पाठ्यक्रम का उपयुक्त न होना :
हमारे देश में शिक्षा के सभी स्तरों पर बालक-बालिकाओं के लिए समान पाठ्यक्रम, पुस्तकें और परीक्षाएँ हैं। अत: अधिकांश लोग इस प्रकार की शिक्षा के विरोधी हैं, क्योंकि उनका विचार है कि बालिकाओं की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक आवश्यकताएँ बालकों से भिन्न होती हैं। अतः एक-समान पाठ्यक्रम बालिकाओं के लिए उपयुक्त नहीं होता। इस ज्ञान-प्रधान और पुस्तक-प्रधान पाठ्यक्रम का बालिकाओं के वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता।
8. बालिका विद्यालयों तथा अध्यापिकाओं की कमी :
शिक्षा के सभी स्तरों पर हमारे देश में बालिका विद्यालयों की कमी है। देश में लगभग दो-तिहाई ग्राम ऐसे हैं, जहाँ प्राथमिक शिक्षा के लिए ही कोई व्यवस्था नहीं है। शेष एक-तिहाई ग्रामों में से अधिकांश में बालिकाओं को बालकों के साथ ही प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है। यही स्थिति माध्यमिक और उच्च शिक्षा के स्तरों पर भी है। अतः सहशिक्षा के कारण भी स्त्री-शिक्षा के प्रसार में बाधा पहुँच रही है। इसी प्रकार प्रशिक्षित अध्यापिकाओं की भी कमी है। अनेक शिक्षित स्त्रियाँ अपने अभिभावकों और पति की अनिच्छा के कारण चाहते हुए भी नौकरी नहीं कर पातीं।
9. दोषपूर्ण शैक्षिक प्रशासन :
भारत में लगभग सभी राज्यों में स्त्री-शिक्षा का प्रशासन पुरुष अधिकारियों के हाथ में है, परन्तु स्त्री-शिक्षा की समस्याओं से पूर्णतया अवगत न होने के कारण और अरुचि के कारण स्त्री-शिक्षा का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।
10. सरकार की उदासीनता :
सरकार स्त्री-शिक्षा के प्रति उतनी जागरूक नहीं है, जितनी कि बालकों की शिक्षा के प्रति है। इस कारण ही स्त्री-शिक्षा के विकास पर बहुत कम धन व्यय किया जा रहा है। सरकार की इस उपेक्षापूर्ण नीति के कारण स्त्री-शिक्षा का वांछित विकास नहीं हो पा रहा है।



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