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भारतीय क्रान्तिकारियों व उनके बलिदान का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

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चन्द्रशेखर आजाद (1906-1931)- चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के झाबुआ तहसील के भावरा गाँव में हुआ। ब्राह्मण परिवार में जन्मे चन्द्रशेखर आजाद एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। इन्होंने हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ की स्थापना की। इन्होंने अपने दल के सदस्यों के साथ लाला लाजपत राय की हत्या के लिए उत्तरदायी पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या की तथा केन्द्रीय असेम्बली हॉल में बम धमाका किया। चन्द्रशेखर आजाद को 23 फरवरी, 1931 ई० को इलाहाबाद के कम्पनी बाग में पुलिस से लड़ते हुए अपनी ही गोली से वीरगति प्राप्त हुई। वे विदेशी शासन के कभी हाथ न आए, इस प्रकार उन्होंने अपना ‘आजाद’ नाम सार्थक रखा।

सुखदेव (1907-1931)- सुखदेव को बाल्यकाल से ही मातृभूमि से विशेष अनुराग था। रानी लक्ष्मीबाई व अन्य वीरों की वीरगाथा उन्हें प्रभावित करती थी। वे भगत सिंह के बचपन के साथी थे तथा भगत सिंह को क्रान्तिपथ पर लाने वाले सुखदेव ही थे। वे नौजवान भारत सभा’ के संस्थापक थे। 15 अप्रैल को लाहौर बम फैक्ट्री कांड में सुखदेव पकड़े गए तथा 23 मार्च, 1931 ई० को सुखदेव अपने मित्र भगत सिंह व राजगुरु के साथ फॉसी पर चढ़ गए।

भगत सिंह (1907-1931)- भगत सिंह का नाम स्वतन्त्रता संग्राम में सर्वोपरि है। क्रान्तिकारी विचार उन्हें विरासत में मिले। साण्डर्स को गोली मारना तथा केन्द्रीय असेम्बली में बम धमाका करना उनके शौर्य का परिचय देता है। उनका उद्घोष ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ देशभक्तों का प्रमुख नारा बन गया। 23 मार्च, 1931 ई० में यह महान् देशभक्त फाँसी पर चढ़ अमर हो गया।
राजगुरु ( 1909-1931)- इनका जन्म पूना के निकट खेड़ा गाँव में हुआ था। वे बनारस में शारीरिक शिक्षक के रूप में काम करने लगे। यहीं राजगुरु क्रान्तिकारियों के प्रभाव में आए। साण्डर्स को सर्वप्रथम गोली का निशाना बनाने वाले राजगुरु ही थे। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर चढ़े। फाँसी के तख्ते पर भगत सिंह बीच में, राजगुरु दाएँ और सुखदेव बाएँ थे। भगत सिंह कह रहे थे- “दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी वतन की खुशबू आएगी।”

शहीद यतीन्द्रनाथ (1904-1929 ई०)- यतीन्द्रनाथ क्रान्तिकारी विचारों और गतिविधियों के कारण 25 नवम्बर, 1925 को ‘बंगाल फौजदारी कानून के अन्तर्गत पकड़े गए थे। इन्होंने लाहौर केन्द्रीय कारागार में देशभक्तों के साथ जेल के अत्याचारों के विरोध में अनशन भी किया, जिसमें 62 दिन के निरन्तर उपवास के बाद यतीन्द्रनाथ 13 सितम्बर, 1929 ई० को शहीद हो गए। रानी गेंडिनल्यू- पूर्वोत्तर भारत में 1930 से 1932 ई० के मध्य क्रांति की जनक रानी पेंडिनल्यू थी। पूर्वोत्तर सीमा प्रान्त के नागरिकों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जागृत करने में गेंडिनल्यू की मुख्य भूमिका रही।
नागाओं का नेतृत्व करने वाली 13 वर्ष की इस बालिका ने इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया। सत्याग्रह आन्दोलन के असफल होने पर रानी ने सशस्त्र क्रान्ति का निश्चय किया। परिणामत: सरकार ने गेंडिनल्यू को गिरफ्तार करने के लिए पुरस्कार की घोषणा की। सेना की मदद से 18 अक्टूबर, 1932 ई० को समोमा ग्राम में रानी को पकड़ लिया गया। उस समय रानी की उम्र 17 वर्ष थी। उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। रानी का पूरा यौवन जेल में व्यतीत हो गया।

रानी देश की आजादी के बाद भी 21 माह तक जेल में रही और 9 अप्रैल, 1949 को रिहा की गई। नेहरू जी ने उसके बारे में सही लिखा था, “एक दिन ऐसा आएगा कि जब भारत उसे स्नेहपर्वक याद करेगा।” स्वतन्त्रता की 25 वीं वर्षगाँठ पर दिल्ली के लाल किले में आयोजित समारोह में जब रानी को ताम्रपत्र प्रदान किया गया तो चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गई। इस महान् स्वतन्त्रता सेनानी को नागालैण्ड की ‘जॉन ऑफ ऑर्क’ कहा गया है।

अन्य क्रान्तिकारियों में रासबिहारी बोष और सचिन सान्याल ने दूर दराज के क्षेत्रों, पंजाब, संयुक्त प्रान्त में क्रान्तिकारी गतिविधियों हेतु गुप्त समितियों का गठन किया था, हेमचन्द्र कानूनगो ने सैन्य प्रशिक्षण के लिए विदेश गमन किया था। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के न्यायाधीश की गाड़ी को बम से उड़ा दिया था। वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में महाराष्ट्र के युवाओं ने सशस्त्र विद्रोह द्वारा अंग्रेजों को खदेड़ने की योजना बनाई। तिलक के शिष्यों दामोदर चापेकर व बालकृष्ण चापेकर ने लेफ्टिनेंट एर्स्ट व मिस्टर रैण्ड की हत्या कर पूना में प्लेग फैलने का बदला लिया। लाला लाजपत राय व अजित सिंह के अतिरिक्त भाई परमानन्द, आग हैदर, उर्दू कवि लालचन्द फलक ने भी पंजाब में क्रान्तिकारी गतिविधियों को नई ऊँचाइयाँ दीं।

अजित सिंह को देश से निर्वासित कर दिया गया और वे फ्रांस पहुँचकर सूफी अम्बा प्रसाद, भाई परमानन्द व लाला हरदयाल के सहयोग से मातृभूमि को स्वतन्त्र कराने के लिए क्रान्तिकारी गतिविधियों में लगे रहे। इंग्लैण्ड में क्रान्ति की ज्वाला को श्यामजीकृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल ढींगरा ने जलाए रखा। इन क्रान्तिवीरों ने ‘इण्डिया हाउस’ नामक संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य भारत में अंग्रेजी शासन को आतंकित कर स्वराज्य प्राप्त करना था। यहीं पर सावरकर ने अपनी कालजयी कृति ‘1857 का स्वतन्त्रता संग्राम’ लिखी। उन्होंने मैजिनी की आत्मकथा का मराठी में अनुवाद किया। ढींगरा को

कर्नल विलियम कर्जन की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर फाँसी पर चढ़ा दिया गया तथा सावरकर को नासिक षड्यन्त्र केस में काले पानी (अंडमान में निर्वासन) की सजा दी गई। फ्रांस में

क्रान्तिकारी गतिविधियों को सरदार सिंह राणा तथा श्रीमती भीकाजी रुस्तम कामा ने पेरिस से जारी रखा, ‘फ्री इण्डिया सोसायटी’ की स्थापना की तथा वन्दे मातरम् अखबार निकाला। भीकाजी विदेशी महिला थीं लेकिन भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में उन्होंने अतुलनीय योगदान किया। उड़ीसा के तट पर स्थित बालासोर पर बाघा जतिन पुलिस के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए।
क्रान्तिकारियों ने विभिन्न पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित कीं, जिनमें देश पर कुर्बान होने वाले जाँबाज किशोर-किशोरियों के त्याग को उकेरा गया। इनमें ‘आत्मशक्ति’, ‘सारथी’, ‘बिजली’ प्रमुख हैं। उपन्यासों में सचिन सान्याल की बन्दी जीवन तथा शरतचन्द्र चटर्जी की पाथेर दाबी उल्लेखनीय हैं। शांतिसुधा घोष ने अध्यापन कार्य जारी रखते हुए नारी शक्तिवाहिनी’ संस्था की स्थापना की, जिसने किशोरियों को अस्त्र संचालन में इतना कुशल बना दिया कि वे साक्षात दुर्गा व चण्डी बन अंग्रेजों का काल बन गईं तथा क्रान्तिकारियों की ढाल बन उनका संबल बनीं।



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