1.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप कैसा था?

Answer»

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना सरकार के अवकाश प्राप्त अधिकारी ए०ओ० ह्यूम ने की थी। ह्यूम ने इसकी स्थापना का स्पष्टीकरण देते हुए बताया था कि पश्चिमी विचारों, शिक्षा, आविष्कारों और यन्त्रों से उत्पन्न हुई उत्तेजना को यहाँ-वहाँ फैलने की बजाय संवैधानिक ढंग से प्रचार करने के लिए यह कदम आवश्यक था। छूम महोदय जानते थे कि भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध घोर असन्तोष है और इस असन्तोष का भयंकर विस्फोट हो सकता है। अत: ह्यूम भारतीयों की क्रान्तिकारी भावनाओं को वैधानिक प्रवाह में परिणित करने के लिए अखिल भारतीय संगठन की स्थापना करना चाहता था। किन्तु लाला लाजपतराय ने कांग्रेस की स्थापना के बारे में लिखा है, “कांग्रेस की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को खतरे से बचाना था, भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करना नहीं, ब्रिटिश साम्राज्य का हित प्रमुख था और भारत का गौण।”

आधुनिक अनुसन्धानों ने यह सिद्ध कर दिया कि ह्यूम एक जागरूक साम्राज्यवादी था। वह शासक और शासित वर्ग के बीच बढ़ती हुई खाई से चिन्तित था। कांग्रेस की स्थापना का दूसरा पहलू यह भी है कि उस समय की राष्ट्रव्यापी हलचलें, देशभक्ति की भावना, विभिन्न वर्गों में व्याप्त बेचैनी, ब्रिटेन की लिबरल पार्टी से भारतीयों को निराशा और विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने इसकी भूमिका तैयार करने में योगदान दिया। कुछ विद्वानों का अभिमत है कि कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य गुप्त योजना था, किन्तु कांग्रेस की पृष्ठभूमि के आधार पर यह तर्कपूर्ण मत नहीं है।

कांग्रेस की स्थापना में ह्यूम को लॉर्ड रिपन और लॉर्ड डफरिन का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था। डफरिन अथवा रिपन के उद्देश्य जो भी कुछ रहे हों, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि छूम महोदय एक सच्चे उदारवादी थे और वे एक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता तथा वांछनीयता अनुभव करते थे। उन्होंने एक खुला पत्र कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय के स्नातकों को लिखा। इसमें उन्होंने लिखा था, “बिखरे हुए व्यक्ति कितने ही बुद्धिमान तथा अच्छे आशय वाले क्यों न हों, अकेले तो शक्तिहीन ही होते हैं। आवश्यकता है संघ की, संगठन की और कार्यवाही के लिए एक निश्चित और स्पष्ट प्रणाली की।” ह्यूम ने इण्डियन नेशनल कांग्रेस के लिए सरकारी तथा गैर-सरकारी व्यक्तियों की सहानुभूति तथा सहायता प्राप्त कर ली। इस प्रकार यह इंग्लैण्ड तथा भारत के सम्मिलित मस्तिष्क की उपज थी।

प्रथम अधिवेशन में देश के विभिन्न भागों से आए हुए 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिसमें सभी जातियों, सम्प्रदायों और वर्गों का प्रतिनिधित्व था। कुछ समय पश्चात् ही सरकार से कांग्रेस का टकराव हो गया और लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस को ‘पागलों की सभा’, ‘बाबुओं की संसद’, ‘बचकाना’ कहना प्रारम्भ किया। कर्जन (1899-1905 ई०) ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए लिखा है कि “मेरा यह अपना विश्वास है कि कांग्रेस लड़खड़ाती हुई पतन की ओर जा रही है और एक महान् आकांक्षा यह है। कि भारत में रहते समय उसकी शान्तिमय मौत में मैं सहायता दे सकें।” हालाँकि कांग्रेस की स्थापना साम्राज्य के लिए रक्षा नली (Safety valve) के रूप में हुई थी, किन्तु जल्दी ही इसकी राजभक्ति राजद्रोह में बदल गई। समाज सुधार के नाम पर यह राजनीति माँगों को लेकर आगे बढ़ी और इसका परिणाम देश की आजादी के रूप में हुआ।



Discussion

No Comment Found