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भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में गोपालकृष्ण गोखले की भूमिका का वर्णन कीजिए।

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गोपालकृष्ण गोखले कांग्रेस के उदारवादी नेता थे। जब से वे कांग्रेस में आये, मृत्युपर्यन्त अपनी विद्वता, नीतिमत्ता, ज्ञान और सात्विक स्वभाव के कारण उस पर छाए रहे। गाँधी जी के राजनीतिक गुरु गोखले ने 1905 ई० में बनारस अधिवेशन की अध्यक्षता की। बंगाल विभाजन तथा इसके परिणामों के बारे में ब्रिटिश जनता को अवगत कराने के लिए वे 1906 ई० में इंग्लैण्ड गए। वहाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1905 ई० में इन्होंने ‘सर्वेन्ट्स ऑफ इण्डिया सोसायटी’ नामक संस्था स्थापित की, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय हितों का संवर्धन करना,
भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करना तथा इनमें पारस्परिक सौहार्द बढ़ाना था। गोखले ने सरकार से इस बात का अनुरोध किया कि नमक पर टैक्स कम किया जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इण्डियन सिविल सर्विस का भारतीयकरण हो। गोखले यह भी चाहते थे कि सेना पर होने वाले व्यय को घटाया जाए। भारतीय मामलों से सम्बन्धित प्रश्नों पर बातचीत के लिए गोखले कई बार इंग्लैण्ड गए। ‘अनिवार्य शिक्षा विधेयक को व्यवस्थापिका परिषद् में उन्हीं के द्वारा प्रस्तुत किया गया था। गोखले ने भारतीय समाज में व्याप्त कई बुराइयों का भी विरोध किया। 1915 ई० में 49 वर्ष की आयु में गोखले का निधन हो गया।



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