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भारतीय उदारवादियों के कार्यक्रम तथा उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।याभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में ए०ओ० ह्युम नामक अंग्रेज क्यों रुचि ले रहे थे?याभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किस प्रकार हुई ? आरम्भ में इसके उद्देश्य, कार्यक्रम तथा कार्य-प्रणाली क्या थी ?याप्रारम्भ में कांग्रेस के क्या उद्देश्य थे ? इसकी प्रारम्भिक नीति को उदारवादी नीति क्यों कहा जाता है ? इसका परित्याग करके उग्र राष्ट्रवाद की नीति क्यों अपनायी गयी ?याभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक चरण में उदारवादियों का आधिपत्य था।” इस कथन की विवेचना कीजिए।याउदारवादी नेताओं के प्रमुख उद्देश्यों को लिखिए।याभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसने की थी ? आरम्भ में इसके क्या उद्देश्य थे? भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन उद्देश्य लिखिए।याअखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब, कहाँ और किसके द्वारा की गयी? इसके तीन मुख्य उद्देश्य लिखिए।याभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब और कहाँ की गयी? इसके प्रमुख उद्देश्य क्या थे?याभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब की गयी? इसके प्रथम अध्यक्ष कौन थे? इसके प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।

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सन् 1885 ई० में भारतीय सिविल सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी सर ए०ओ० ह्युम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की दिशा में पहल की। इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को यह प्रेरणा दी कि वे एक ऐसी संस्था का निर्माण करें जो भारतीयों के सामाजिक, राजनीतिक तथा आध्यात्मिक जीवन का उत्थान कर सके। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन ने भी इस दिशा में सहयोग दिया, क्योंकि इस प्रकार की संस्था से भारतीयों की इच्छा तथा कार्यक्रमों का पता चलता रहता और ब्रिटिश सरकार उचित कार्रवाई करके 1857 ई० की क्रान्ति जैसी अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति न होने देती। सन् 1884 ई० में मद्रास (चेन्नई) में दीवान बहादुर रघुनाथ राय के निवास पर एक अखिल भारतीय संस्था की स्थापना की योजना बनी, जिसके फलस्वरूप 1885 ई० में इस संस्था की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में हुई। कांग्रेस की स्थापना में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयब जी आदि ने भी सहयोग दिया। कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1885 ई० में व्योमेशचन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में बम्बई में हुआ था। द्वितीय अधिवेशन 1886 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में तथा तीसरा अधिवेशन मद्रास(चेन्नई) में बदरुद्दीन तैयब जी की अध्यक्षता में हुआ था।

सन् 1885-1905 ई० में उदारवादियों के उद्देश्य तथा कार्यक्रम

कांग्रेस के आरम्भिक दौर में नरमपन्थी नेताओं; जैसे-दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले आदि का प्रभुत्व बना रहा। उनके उद्देश्य तथा कार्य निम्नलिखित थे

1. उन्होंने विधानसभाओं की शक्तियों के विस्तार तथा स्वशासन में प्रशिक्षण की माँग की।

2. उन्होंने आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत गरीबी को दूर करने के लिए कृषि का विकास करने, भू-राजस्व कम करने तथा उद्योगों के विस्तार की माँग की।

3. उन्होंने प्रशासकीय सेवाओं के उच्च पदों का भारतीयकरण करने की माँग की।

4. उन्होंने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए भाषण तथा प्रेस की स्वतन्त्रता की माँग की।

इस प्रकार भारतीय नेताओं ने राष्ट्रीय जागृति पैदा की तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनमत तैयार किया। इन मेताओं ने एक राजनीतिक तथा आर्थिक कार्यक्रम देकर देशवासियों को एक ही मंच से राष्ट्रीय संघर्ष करने के लिए तैयार किया।

उदारवादियों की कार्यप्रणाली

1. अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इन नेताओं ने शान्तिपूर्ण संवैधानिक तरीके अपनाये।

2. उन्हें ब्रिटिश शासकों की न्यायप्रियता पर पूरा विश्वास था; अत: उन्होंने ब्रिटिश शासकों से मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखा।

3. वे संवैधानिक सुधारों में विश्वास करते थे; अतः वे याचिकाएँ, अपीलें, निवेदन-पत्र आदि ब्रिटिश सरकार को इस आशा से भेजते थे कि वह उन पर सहानुभूतिपूर्ण ढंग से विचार करेगी तथा उनकी माँगों को स्वीकार करेगी। इसी कारण इनकी कार्यप्रणाली तथा नीतियों को उदारवादी नीति कहा जाता है। कुछ अन्य विद्वान इन उदारवादी नेताओं की कार्यप्रणाली को ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ की संज्ञा भी देते हैं।

उपलब्धियाँ

ब्रिटिश सरकार ने नरमपन्थियों से कोई सहयोग नहीं किया; अतः ये नेता अपने उद्देश्य की प्राप्ति में विफल रहे। इसलिए 1905 ई० के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन की बागडोर गरमपन्थी नेताओं के हाथों में चली गयी, जो क्रान्तिकारी साधनों द्वारा अपना उद्देश्य प्राप्त करना चाहते थे।

उग्र राष्ट्रवाद की नीति अपनाने के कारण उदारवादी युग की 20 वर्षों की लम्बी अवधि में भी कांग्रेस लोगों में जागृति पैदा करने में सफल न हो सकी। उदारवादी आन्दोलन की सफलता अंग्रेजों की सहानुभूति और दया पर निर्भर थी। कांग्रेस को आन्दोलन जनता का आन्दोलन न था।

उदारवादियों ने सरकार से रियायतें माँगीं, स्वतन्त्रता नहीं। इसको आधार बलिदान नहीं था। बंकिम चन्द्र चटर्जी ने इस आन्दोलन को भिक्षावृत्ति की संज्ञा दी। लाला लाजपत राय ने लिखा कि 20 वर्षों के आन्दोलन के बाद भी रोटी के स्थान पर अंग्रेजों से पत्थर ही मिले।

उदारवादी अंग्रेजी ताज के प्रति भक्ति-भाव रखते थे। उनकी एक और गलती यह थी कि उनका विश्वास था कि यदि अंग्रेज भारत से चले गये तो भारतीय हितों की हानि होगी। उदारवादी लोगों की आकांक्षाओं को समझ न सके। वे यह भी न समझ सके कि भारतीयों और अंग्रेजों के हित एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसलिए बिना लड़े अंग्रेज अपने अधिकारों को छोड़ने को तैयार न थे।

सन् 1915 ई० तक उदारवादी नेताओं का कांग्रेस पर पूरा अधिकार था, परन्तु धीरे-धीरे उग्रवादी नेताओं ने उनके नेतृत्व को चुनौती दी और अन्ततः 1923 ई० में उदारवादी युग पूरी तरह समाप्त हो गया।



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