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भौगोलिक कारकों का मानव के सामाजिक जीवन पर कैसे प्रभाव पड़ता है.?

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कई भूगोलविदों ने भौगोलिक कारकों एवं सामाजिक संस्थाओं का सम्बन्ध प्रकट किया है। उदाहरण के लिए, जिन स्थानों पर खाने-पीने एवं रहने की सुविधाएँ होती हैं, वहाँ संयुक्त परिवार पाये जाते हैं और जाँ-इनका अभाव होता है, वहाँ एकाकी परिबार। जहाँ प्रकृति से संघर्ष करना होता है, वहाँ पुरुषप्रधान समाज होते हैं। इसी प्रकार से जहाँ जीविकोपार्जन की सुविधाएँ सरलता से मिल जाती हैं और कृषि की प्रधानता होती है, वहाँ बहुपत्नी प्रथा तथा जहाँ जीवन-यापन कठिन होता है, वहाँ बत्तिाप्रथा अथवा एक विवाह की प्रथा पायी जाती है। इसका कारण यह है कि संघर्षपूर्ण पर्यावरण में स्त्रियों का भरण-पोषण सम्भव न होने से कन्या-वध आदि की प्रथा पायी जाती है, जिससे उनकी संख्या घट जाती है। जिन स्थानों पर जीवन-यापन के लिए कठोर श्रम एवं सामूहिक प्रयास करना होता है, वहाँ सामाजिक संगठन सुदृढ़ होता है।

भारत के भौगोलिक पर्यावरण ने यहाँ के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है। खस एवं टोडा जनजातियाँ पहाड़ी भागों में निवास करती हैं, जहाँ परिवार को आर्थिक भरण-पोषण कठिनाई से होता है। उन्हें जीवन-यापन के लिए प्रकृति से घोर संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष में स्त्रियाँ और भी कमजोर होती हैं। अत: वहाँ जन्म के समय ही लड़कियों को मार देने की प्रथा पायी जाती है, जिसके कारण इन समाजों में पुरुषों की अधिकता एवं स्त्रियों की कमी पायी जाती है। इस विषम लिंग अनुपात के कारण यहाँ बहुपति विवाह की प्रथा विकसित हुई। दूसरी ओर उत्तरी भारत के मैदानी भागों में जीवन-यापन सरल है; इससे वहाँ लिंग-अनुपात लगभग समान है, अतः वहाँ एक विवाह प्रथा विकसित हुई और सम्पन्न लोग एकाधिक पत्नियाँ भी रखने लगे, जिनसे बहुपत्नी प्रथा का जन्म हुआ।

दक्षिणी भारत के पठारी क्षेत्र होने के कारण लोगों को दूर क्षेत्र तक गमन कठिन था। अत: उनका विवाह एवं नातेदारी का क्षेत्र अपने गाँवों या निकटवर्ती गाँवों तक ही सीमित रहा, जब कि उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में विवाह एवं नातेदारी का विस्तार दूर-दराज के क्षेत्रों तक पाया जाता है। मैदानी क्षेत्रों में पुरुष का दबदबा अधिक होने से पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था ने जन्म लिया। गारो, खासी और जयन्तिया जनजातियाँ जो कि मातृसत्तात्मक हैं, पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती हैं। इनमें पुरुष जीवन-यापन की सुविधाएँ जुटाने, शिकार करने एवं जंगलों से कन्द-मूल-फल एकत्रित करने एवं कृषि के लिए अधिकांश समय तक घर से बाहर ही रहता है। ऐसी स्थिति में परिवार एवं बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व महिलाओं पर आ जाता है, इससे परिवार में महिलाओं को प्रभुत्व स्थापित हुआ एवं मातृसत्तात्मक परिवार पनपे।



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