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“भौजी जैसी तपसिनी हमने देखी नहीं।” रत्नावली के किस तपस्विनी रूप का वर्णन किया गया है?

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राजा ने तुलसी से कहा कि तुम यहाँ तपस्या करते हो, भौजी गाँव में तपस्या करती हैं। उन जैसी तपस्विनी मैंने नहीं देखी। वे गाँव में तुम्हारी रुचि की रसोई बनाती रहीं और किसी भूखे बंगले को खिलाती थीं। आप बिना चुपड़ी बिना सागभाजी के दो रोटी खाकर अपने दिन बिताती हैं। रोज तुम्हारी धोती धोना, तुम्हारी पूजा की सामग्री लगाना, तुम्हारे बैठक में झाड़ लगाना, तुम्हारी एक-एक चीज को सहेज-सँभालकर रखना, यह सारे काम वे करती हैं। यह उनकी तपस्या ही है। ऐसी तपस्या भौजी ही कर सकती हैं। इसलिए राजा ने उन्हें तपस्विनी कहा।



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