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बिदेशिया गीत किस प्रकार के होते हैं ?​

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बिदेसिया उत्तर प्रदेश के पूर्वी ज़िलों में, विशेषकर बलिया, देवरिया तथा बिहार के पश्चिमी ज़िलों (आरा और छपरा) में प्रचलित अत्यंत लोकप्रिय गीत हैं। ये साधारण जनता की जिह्वा पर सदा नाचते रहते हैं। भोजपुरी प्रदेश में बिदेसिया नाटक का इतना अधिक प्रचार व लोकप्रियता है कि सहस्त्रों की संख्या में ग्रामीण जनता इसके अभिनय को देखने के लिए उपस्थित होती है

इन सुप्रसिद्ध 'बिदेसिया' गीतों के रचयिता भिखारी ठाकुर थे, जो बिहार के छपरा ज़िले के निवासी थे। भिखारी ठाकुर ने अपना परिचय देते हुए स्वयं लिखा है कि- "जाति के हजाम मोर कुतुबपुर ह मोकाम, छपरा से तीन मील दियरा में बाबूजी। पुरुब के कोना पर गंगा के किनारे पर, जाति पेसा बाटे विद्या नहीं बाटे बाबूजी।" इससे पता चलता है कि भिखारी ठाकुर एक अनपढ़ लोककवि थे, परंतु उनकी प्रतिभा बड़ी विलक्षण थी।[1] बिदेसिया बिछोह और मिलन की अभिलाषा के गीत हैं, जिनमें लोकनायक नायिका के मन की आतुरता का सहज चित्रण होता है, जिसमें आलंभ भी होता है। उतरती गहरी सुनसान रात में बिदेसिया गीतों की तानें सुनने वालों को बैचेन कर ‌‌देती है

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