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बंबई में रहकर कला के अध्ययन के लिए रज़ा ने क्या-क्या संघर्ष किए ?

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बंबई में रहकर कला के अध्ययन के लिए रज़ा ने कड़ा संघर्ष किया । सबसे पहले उन्हें एक्सप्रेस ब्लॉक स्टूडियो में डिजाइनर की नौकरी मिली । वे सुबह दस बजे से सायं छह बजे तक वहाँ काम करते थे फिर मोहन आर्ट क्लब जाकर पढ़ते और अंत में जैकब सर्कल में एक परिचित ड्राइवर के ठिकाने पर रात गुजारने के लिए जाते थे।

कुछ दिन बाद उन्हें स्टूडियो के आर्ट डिपार्टमेंट में कमरा मिल गया । उन्हें फर्श पर सोना पड़ता था । वे रात के ग्यारह-बारह बजे तक चित्र व रेखाचित्र बनाते थे । उनकी मेहनत देखकर उन्हें मुख्य डिज़ाइनर बना दिया गया । कठिन परिश्रम के कारण उन्हें मुंबई आर्ट्स सोसायटी का स्वर्ण पदक मिला । 1943 ई. में उनके दो चित्र आर्ट्स सोसायटी ऑफ इंडिया की प्रदर्शनी में रख्खे गए, किंतु उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया।

उनके चित्रों की प्रशंसा हुई । उनके चित्र 40-40 रुपये में बिक गए । वेनिस अकादमी के प्रोफेसर वाल्टर लैंगहमर ने उन्हें अपना स्टूडियो दिया । लेखक दिनभर मेहनत करके चित्र बनाता था तथा लैंगहैमर उन्हें देखते तथा खरीद भी लेते । इस प्रकार लेखक नौकरी छोड़कर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट का नियमित छात्र बना।



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