| 1. |
बँटवारे के सवाल पर कांग्रेस की सोच कैसे बदली? |
|
Answer» भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रारंभ से ही विभाजन का विरोध करती रही थी। किन्तु अंत में परिस्थितियों से विवश होकर उसे अपनी सोच बदलनी पड़ी और विभाजन के लिए तैयार होना पड़ा। अंग्रेजों के प्रयासों के परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग अपने जन्म के प्रारंभ से ही सांप्रदायिक नीतियों का अनुसरण करने लगी थी। लीग ने बंगाल विभाजन का समर्थन किया था और स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन में कोई भाग नहीं लिया था। यद्यपि 1916 ई० में कांग्रेस और लीग में समझौता हो गया था, किन्तु 1920 और 1937 ई० में कांग्रेस द्वारा संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मंत्रिमंडल बनाने से इनकार कर दिए जाने पर कांग्रेस और लीग के संबंध और अधिक बिगड़ गए थे। कांग्रेस ने बार-बार लीग को संतुष्ट करने का प्रयत्न किया, जिसके परिणामस्वरूप लीग की अनुचित माँगें तीव्र गति से बढ़ने लगीं। लीग ने कांग्रेसी मंत्रिमंडलों पर जनमत की अवहेलना करने, मुस्लिम संस्कृति को नष्ट करने और मुसलमानों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनैतिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया। जिन्नाह ने 1937 ई० में लीग के लखनऊ अधिवेशन में स्पष्ट शब्दों में घोषणा की “अब हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा होगी और वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत होगा। कांग्रेस के झंडे को प्रत्येक व्यक्ति को स्वीकार करना पड़ेगा और उसका आदर करना पड़ेगा।” राष्ट्रवादी नेताओं ने लीग के नेताओं को समझाने का बार-बार प्रयास किया, किन्तु संप्रदायवाद से समझौता कर सकना या उसे संतुष्ट कर सकना संभव नहीं था। 1937 से 39 की अवधि में कांग्रेस के नेताओं ने बार-बार जिन्नाह से मुलाकात करके उसे मनाने का प्रयास किया, किन्तु जिन्नाह ने कभी कोई ठोस माँग सामने नहीं रखी। इसके विपरीत वह इस बात पर अड़े रहे कि वह कांग्रेस से तभी बात करेंगे जब कांग्रेस यह मान लेगी कि वह केवल हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार सम्प्रदायवाद को जितना संतुष्ट करने का प्रयास किया गया उतना ही वह और उग्र होता गया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सभी कांग्रेसी मंत्रिमंडलों द्वारा नवम्बर 1939 ई० में त्यागपत्र दे दिए जाने पर मुस्लिम लीग अत्यधिक प्रसन्न हुई। 22 दिसम्बर, 1939 ई० को लीग ने संपूर्ण भारत में ‘मुक्ति दिवस’ मनाया। मार्च 1940 ई० में लाहौर अधिवेशन में लीग ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत करके माँग की कि हिन्दुस्तान के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन भागों में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें इकट्ठा करके स्वतंत्र राज्य बना दिया जाए। लीग ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और अंतरिम सरकार में कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को नामजद करने के अधिकार को स्वीकार नहीं किया। लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया और पाकिस्तान की प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष संघर्ष का रास्ता अपनाने का निश्चय कर लिया। 16 अगस्त, 1946 ई० को लीग ने ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ मनाया जिसके परिणामस्वरूप बंगाल, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, सिंध व उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में भयंकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो गए। सारे देश का वातावरण दूषित हो गया और मुस्लिम सांप्रदायिकता अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँच गई। लीग का नारा था, ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान!’ किन्तु इस नारे ने ब्रिटिश साम्राजियों के विरुद्ध संघर्ष का रूप धारण न करके सांप्रदायिक दंगे का रूप धारण कर लिया। कुछ प्रारंभिक विरोध के बाद वायसराय लार्ड वेवल के प्रयत्नों से मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में, सम्मिलित हो तो गई किन्तु उसने कांग्रेस के प्रति असहयोग का दृष्टिकोण अपनाया। लीग ने नेहरू के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया और प्रायः मंत्रीमंडल की नीतियों का विरोध करती रही। इस समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी यह भली-भाँति समझ चुकी थी की लीग के कट्टर सांप्रदायिक दृष्टिकोण को बदलना संभव नहीं है। लीग के कार्यकलापों से सांप्रदायिक दंगे फैलने लगे थे जिनसे पूरे देश में गृहयुद्ध का वातावरण बन गया था। ब्रिटिश सरकार जून, 1948 ई० तक सत्ता भारतीयों को सौंप देने की घोषणा कर चुकी थी। वायसराय लार्ड माउंटबेटन का विचार था कि लीग तथा कांग्रेस के मध्य समझौता असंभव था और देश का विभाजन ही समस्या का एकमात्र हल था। अतः उसने महात्मा गाँधी, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू जैसे महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं को भारत विभाजन के लिए मनाने के प्रयत्न प्रारंभ कर दिए। यद्यपि कांग्रेस ने विभाजन का सदैव विरोध किया था और गाँधी जी स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा कर चुके थे कि देश का विभाजन उनके मृत शरीर पर होगा, किन्तु अब ऐसा आभास होने लगा कि देश को भयंकर विनाश और रक्तपात से बचाने के लिए विभाजन को स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था। अंग्रेजों ने भारत छोड़ने की तिथि जून, 1948 ई० के स्थान पर 15 अगस्त, 1947 ई० निश्चित कर दी थी। अतः अब कांग्रेस को अनिवार्य रूप से ‘गृहयुद्ध या पाकिस्तान’ इन दोनों में से एक का चुनाव करना था। अन्ततः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अपनी सोच बदलनी पड़ी और प्रमुख राष्ट्रवादी नेता इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत विभाजन को स्वीकार करना और लीग के बिना शेष भारत को अधिक शक्तिशाली एवं संगठित बनाना ही भारत की रक्षा का श्रेयस्कर उपाय था। 3 जून, 1947 ई० को वायसराय ने भारत विभाजन की योजना की घोषणा कर दी, जिसे भारत के सभी राजनैतिक दलों ने स्वीकार कर लिया। स्थिति की विवेचना करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि, “हालात की मजबूरी थी। और यह महसूस किया गया कि जिस मार्ग का हम अनुसरण कर रहे थे उससे गतिरोध को हल नहीं किया जा सकता था। जब दूसरे हमारे साथ रहना ही नहीं चाहते थे, तो हम उन्हें क्यों और कैसे मजबूर कर सकते थे। इसलिए हमने देश का बँटवारा स्वीकार कर लिया ताकि हम भारत को शक्तिशाली बना सकें।” |
|