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“चावल के दाने” पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखो।

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तेनाली के रहनेवाले तेनालीराम बहुत चतुर और ज्ञानी व्यक्ति थे। उनकी मुलाकात राजा कृष्णदेवराय से न होने के कारण वे एक दिन उनकी राजधानी हंपी पहुँचे । राजदरबार में पेश करने के बाद तेनाली राम ने राजा को एक सुंदर कविता सुनाई । राजा को कविता पसंद आने से ईनाम माँगने को कहा ! तब तेनालीराम ने कहा कि “क्षमा करें महाराज मेरा आपसे एक निवेदन है।” राजा की अनुमति से तेनालीराम वहाँ के शतरंज की बिसात की ओर इशारा करते हुये कहा कि “महाराज ! यदि आप चावल का एक दाना उस शतरंज के पहले खाने में रख दें और अगले खाने में पिछले खाने का दुगना रखते जायें तो मैं उसे ही अपना ईनाम समझूगा”। राजा फिर आश्चर्य से पूछा कि तुम्हें यकीन है कि “सिर्फ चावल के दाने चाहिए, सोना नहीं।” तेनालीराम ने विनम्रता से “हाँ” कहा ।

महाराज ने सेवक को आदेश देने से चावल के दाने रखने शुरू कर दिये । पहले खाने में एक दाना दूसरे में 2 दाने, तीसरे में चार, चौथे में 8 इस प्रकार दसवें खाने तक पहुँचने पर 512 दाने रखे गये और बीसवें खाने तक पहुँचने पर 5, 24, 288 दाने रखे गये। इस प्रकार शतरंज के आधी बिसात यानी 32 खाने तक पहुँचने तक दानों की संख्या 214 करोड़ से भी ज़्यादा तक पहुंच चुकी थी। कुछ देर के बाद ऐसी हालत पहुँच गई कि पूरा राजभंडार का अनाज तेनालीराम के हवाले करने के सिवाय कोई दूसरा मार्ग न रहा ।

तब तेनालीराम ने राजा से कहा कि “महाराज मैं आपसे कुछ नहीं चाहता । मैं तो आपको यह दिखाना चाहता था कि छोटी-छोटी चीजें भी कितनी महत्वपूर्ण होती हैं। एक महान विजय हासिल करने के लिए पहले कदम उठाना आवश्यक है मेरी हार्दिक कामना है कि आप इसी प्रकार आगे बढ़ते हुए और अधिक विजय प्राप्त करें।”

चावल के एक दाने से जीवन का महत्व समझाने के कारण राजा खुश होकर तेनालीराम को अपने अष्टदिग्गजों में शामिल कर लिया।



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