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चेन्नई से राजमहेंद्री जाते समय लेखक की भावनाएँ कैसी थी?

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पाठ का नाम : दक्षिणी गंगा गोदावरी
लेखक : श्री काका कालेलकर
विधि : यात्रा वृत्तांत

चेन्नई से राजमहेंद्री जाते समय लेखक की भावनाएँ इस प्रकार थीं।

  • चेन्नई से राजमहेंद्री जाते हुए बेजवाडे से आगे सूर्योदय हुआ।
  • पूर्व की तरफ एक नहर रेल की पटरी के किनारे – किनारे बह रही थी।
  • पर किनारा ऊँचा होने के कारण पानी उन्हें कभी – कभी ही दीख पडता।
  • तितली की तरह अपने – अपने पाल कतार में खड़ी हुई नौकाओं पर ही उन्हें नहर का अनुमान करना पड़ा।
  • बीच – बीच में छोटे – छोटे तालाब भी मिलते ।
  • इनमें रंग – बिरंगे बादलों वाला आसमान नहाने के लिए उतरता हुआ दिखाई पड़ता।
  • कहीं – कहीं चंचल कमलों के बीच खामोश खड़े हुए बगुलों को देखकर सबेरे की ठंडी – ठंडी हवा का अभिनंदन को लेखक का मन मचल पडता ।
  • कोव्वूर स्टेशन आने पर लेखक के मन में यह उमंग भरी थी कि अब यहाँ से गोदावरी मैया के भी दर्शन होने लगेंगे। लेखक बेजवाडे में कृष्ण माता के दर्शन पर गर्व करने लगा।
  • लेकिन राजमहेंद्री के आगे गोदावरी की शान – शौकत कुछ निराली लगी।
  • लेखक ने पश्चिम की तरफ नजर फैलाई तो दूर – दूर तक पहाडियों की श्रेणियाँ नज़र आई।
  • लेखक को इस सारे दृश्य पर वैदिक प्रभाव की शीतल और स्निग्ध सुंदरता छाई हुई दिखाई दी।
  • पहाडी पर कुछ उतरे हुए धौले – धौले बादल तो लेखक को बिल्कुल ऋषि – मुनियों जैसे लगते थे।
  • लेखक को ऊँचे – ऊँचे पेडों को देखने पर ऐसा लगा कि वे विजय पताकाएँ खड़ी कर रखी थी।


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