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दण्ड देने के औचित्य में गाँधी जी को क्या शंका थी?

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गाँधी जी मारपीट कर पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। दण्ड के औचित्य के सम्बन्ध में उन्हें शंका थी क्योंकि उसमें क्रोध भरा था और दण्ड देने की भावना थी । यदि उसमें केवल गाँधी जी के दुःख का ही प्रदर्शन होता, तो वे उस दण्ड को उचित समझते । पर उसमें भावना मिश्रित थी। इसके बाद उन्होंने विद्यार्थियों को दण्ड नहीं दिया और सुधारने की अच्छी रीति सीख ली क्योंकि उन्हें दण्ड द्वारा किसी को सुधारने में शंका थी।



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