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एक वृक्ष की हत्या कविता का भावार्थ : |
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Answer» प्रस्तुत कविता में कुँवर नारायण ने वृक्षों के प्रति अपनी संवेदना जताई है। कवि वृक्ष को दोस्त के रूप में देखते हैं। मानवीय भावनाओं को यहाँ देखा जा सकता है। 1) अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था…. पाँवों में फटापुराना जूता कवि कहता हैं कि अब की बार जब वह घर लौटा, तो वह बूढ़ा चौकीदार वृक्ष, जो हमेशा घर के दरवाजे पर मिलता था वह नहीं था। पुराने चमड़े का बना हुआ उसका शरीर, वही कठोर जान, झुर्रियों वाला खुरदरा तना मैला-कुचैला, राइफिल की तरह उसकी सूखी डाल, एक फूल-पत्तीदार वाली पगड़ी, पाँवों में फटा-पुराना जूता चरमराता, परन्तु अक्खड़ बल-बूते वाला। कहाँ गया वह वृक्ष? 2) धूप में, बारिश में, धूप में, वर्षा में, सर्दी-गर्मी में हमेशा चौकन्ना रहकर अपनी खाकी वर्दी में दूर से ही ललकारता था – ‘कौन?’ कवि जवाब देता – ‘दोस्त!’ और कुछ क्षण उसकी छाया में बैठ जाता। वास्तव में कवि को संदेह था कि कोई जानी दुश्मन आ गया होगा! इन दुश्मनों से बचाना है। 3) कि घर को बचाना है लुटेरों से घर को लुटेरों से, शहर को नादिरों से, देश को दुश्मनों से बचाना है। नदियों को नालों से, हवा को धुंए से, खाने को जहर से, जंगल को मरुस्थल से और मनुष्य को जंगल हो जाने से बचाना है। |
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