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घर की सजावट के मूलभूत सिद्धान्त कौन-कौन से हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।याघर की आन्तरिक सजावट के क्या सिद्धान्त हैं? इनकी क्या उपयोगिता है?याघर की आन्तरिक सजावट से क्या तात्पर्य है? घर की सजावट के लिए किन-किन सिद्धान्तों को ध्यान में रखना चाहिए और क्यों?याभीतरी सजावट के प्रमुख सिद्धान्त लिखिए।

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घर की सजावट के सिद्धान्त जैसा कि हम जानते हैं कि गृह-सज्जा अपने आप में एक व्यवस्थित कला एवं विज्ञान है; अतः गृह-सज्जा का कुछ सिद्धान्तों पर आधारित होना स्वाभाविक है। विद्वानों ने गृह-सज्जा के तीन मुख्य
गृह-सज्जा (घर की सजावट) 55 सिद्धान्तों का उल्लेख किया है। ये सिद्धान्त क्रमश:
इस प्रकार हैं–
⦁    सुन्दरता,
⦁    अभिव्यक्ति तथा
⦁    उपयोगिता।

गृह-सज्जा के इन तीनों सिद्धान्तों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है-

(1) सुन्दरता--गृह-सज्जा का मूलभूत तथा मुख्य सिद्धान्त है–सुन्दरता। आदिकाल से ही व्यक्ति सुन्दरता का उपासक है। व्यक्ति स्वभाव से ही सौन्दर्यप्रिय है तथा अपनी प्रत्येक वस्तु एवं पर्यावरण को सुन्दर एवं आकर्षक देखना चाहता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है। कि गृह-सज्जा को उद्देश्य घर को सुन्दर एवं आकर्षक बनाना होता है। सुन्दरता के अभाव में किसी भी घर को सुसज्जित नहीं माना जा सकता, भले ही घर में असंख्य बहुमूल्य वस्तुएँ क्यों न एकत्र कर दी जाएँ।

सैद्धान्तिक रूप से यह स्वीकृत है कि सुसज्जित गृह को सुन्दर एवं आकर्षक होना चाहिए, पत। प्रश्न यह उठता है कि सुन्दरता से क्या आशय है? सुन्दरता के अर्थ को प्रस्तुत करना इतना सरल नई है। यह एक जटिल प्रश्न है तथा भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से इसकी व्याख्या की जाती रही है। भिन्न-भिन्न कालों में सुन्दरता के प्रतिमान बदलते रहे हैं।
 
इस कठिनाई के होते हुए भी सुन्दरता को परिभाषित करने के प्रयास सदैव होते रहे हैं। ए० एच० रट (A. H. Rutt) के शब्दों में, “सुन्दरता गुणों का वह संयोजन है, जो पारखी आँखों या कानों को सुखद लगे।” इसी से मिलती-जुलती परिभाषा सुन्दरराज ने इन शब्दों में प्रस्तुत की है, “सुन्दरता वह तत्त्व अथवा गुण है, जो इन्द्रियों को आनन्दित करता है तथा आत्मा को उच्च अनुभूति देता है।” इस कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि सुन्दरता का सम्बन्ध हमारे शरीर तथा आत्मा दोनों से होता है। सुन्दरता सदैव आनन्ददायक होती है तथा उसका प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। गृह-सज्जा में निहित सुन्दरता का अच्छा प्रभाव घर में रहने वाले समस्त व्यक्तियों पर पड़ता है।

घर की आन्तरिक सुन्दरता व्यक्ति एवं परिवार को सुख देने में सहायक होती है। अब प्रश्न उठता है कि गृह-सज्जा में सौन्दर्य का समावेश कैसे हो? इस विषय में रट महोदय का कहना है कि गृह-सज्जा में सौन्दर्य का विकास अध्ययन, निरीक्षण तथा अनुभव द्वारा किया जा सकता है। आजकल प्राय: सभी पत्र-पत्रिकाओं में गृह-सज्जा सम्बन्धी अनेक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। इसी प्रकार दूरदर्शन तथा फिल्मों के माध्यम से भी गृह-सज्जा में सौन्दर्य के तत्त्व को जाना जा सकता है। गृहिणी अपने अनुभवों द्वारा भी गृह-सज्जा को अधिक सुन्दर एवं आकर्षक बना सकती है। वर्तमान समय में दूरदर्शन के प्रायः सभी धारावाहिक अपने मूल  कथानक के प्रदर्शन के साथ-ही-साथ गृह-सज्जा एवं उत्तम जीवन-शैली को भी दर्शाया करते हैं।

(2) अभिव्यक्ति-गृह-सज्जा का एक सिद्धान्त अभिव्यक्ति या अभिव्यंजकता भी है। गृह-सज्जा के माध्यम से कुछ-न-कुछ स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। इसी अभिव्यक्ति के आधार पर गृह-सज्जा का मूल्यांकन किया जाता है। अभिव्यक्ति एक व्यक्तिगत विशेषता मानी जा सकती है, जो गृह-सज्जा द्वारा प्रकट होती है। इस तथ्य को सुन्दरराज ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “यह वह गुण है, जो एक घर को दूसरे से भिन्न बनाता है। यह घर में रहने वाले सदस्यों के व्यक्तित्व को स्पष्टतः प्रतिबिम्बित करता है।”

अब प्रश्न उठता है कि गृह-सज्जा के सन्दर्भ में अभिव्यक्ति का क्या स्थान एवं महत्त्व है? इस विषय में टी० एफ० हेमलिन (T. F. Hamlin) ने स्पष्ट किया है, “प्रत्येक भवन, प्रत्येक सुनियोजित कक्ष में यह सामर्थ्य होनी चाहिए कि वह हमें आनन्द, शान्ति अथवा शक्ति का सन्देश दे सके।” स्पष्ट है कि गृह-सज्जा से भावनाओं एवं विचारों की अभिव्यक्ति होती है। गृह-सज्जा के माध्यम से विश्रांति, जीवन्तता, स्वाभाविकता, आत्मीयता, औपचारिकता तथा दृढ़ता आदि भावनाएँ प्रकट होती हैं।

इस प्रकार की भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाली गृह-सज्जा को उत्तम गृह-सज्जा माना जाता है। इससे भिन्न यदि किसी गृह-सज्जा से भड़कीलापन या सुरुचि एवं स्वच्छता की कमी अभिव्यक्त होती हो तो उस गृह-सज्जा को उत्तम नहीं माना जाएगा। उत्तम गृह-सज्जा से औपचारिकता, अनौपचारिकता, स्वाभाविकता तथा आधुनिकता के गुणों की भी अभिव्यक्ति होनी चाहिए।
 
(3) उपयोगिता-गृह-सज्जा का एक मूल सिद्धान्त है–गृह-सज्जा का उपयोगी होना। भवननिर्माण के सन्दर्भ में एक अमेरिकी वास्तुकार लुई सलीवन का कथन है कि भवन की आकृति को
व्यावहारिक होना चाहिए। इस मान्यता के अनुसार गृह-सज्जा को उपयोगी होना चाहिए। निरर्थक एवं कोरी सजावट उचित नहीं होती। इस सिद्धान्त के अनुसार घर का निर्माण तथा उसकी सज्जा वैज्ञानिक तथा एक सुनिश्चित दृष्टिकोण के अनुसार होनी चाहिए।

जिस प्रकार किसी यन्त्र या उपकरण से हम अधिकतम कार्यशीलता की अपेक्षा करते हैं, उसी प्रकार घर से भी अधिकतम सुविधा तथा उपयोगिता की अपेक्षा की जाती है। यह तभी सम्भव है, जब कि गृह-सज्जा में उपयोगिता के सिद्धान्त का समावेश हो। इस सिद्धान्त को महत्त्व देते हुए यह ध्यान रखा जाता है कि गृह-सज्जा के लिए केवल उन्हीं वस्तुओं एवं उपकरणों को चुना जाए जो उपयोगी हों। जो वस्तुएँ या उपकरण उपयोगी नहीं होते, उन्हें एकत्र करना उचित नहीं माना जाता। इस मान्यता के अनसार घर के प्रत्येक कक्ष में उपयोगिता को ध्यान में रखकर ही वस्तुओं को रखा जाता है। गृह-सज्जा के लिए अपनाई जाने वाली प्रत्येक वस्तु की उपयोगिता की भली – भाँति परख कर लेनी चाहिए।

उदाहरण के लिए-सोफा एवं सोफे का कवर ऐसा । होना चाहिए, जो अधिक मजबूत, टिकाऊ एवं सुविधाजनक हो। अनावश्यक मीनाकारी, कढ़ाई एवं कृत्रिम सुन्दरता को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। इसी प्रकार परदे तथा कालीन भी मजबूत एवं पक्के रंग के होने चाहिए। जो वस्तुएँ किसी प्रकार की असुविधा उत्पन्न करती हों, उन्हें गृह-सज्जा में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य है कि उपयोगिता के सिद्धान्त को मानते हुए गृह-सज्जा में सुन्दरता एवं आकर्षकता के तत्त्व की पूर्ण अवहेलना नहीं की जानी चाहिए। वास्तव में सुन्दरता तथा उपयोगिता, कला तथा विज्ञान का समन्वय होना चाहिए। गृह-सज्जा में समन्वयात्मक सिद्धान्त को ही अपनाया जाना चाहिए, जिसमें सुन्दरता, अभिव्यक्ति तथा उपयोगिता का समुचित समावेश हो।



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