| 1. |
गृह-सज्जा के कलात्मक सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।यासजावट के मूलभूत आधार क्या हैं? सजावट में रंग-व्यवस्था का क्या महत्त्व है? स्पष्ट कीजिए।यागृह-सज्जा के मूलभूत कलात्मक सिद्धान्त कौन-से हैं? किन्हीं दो सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। |
|
Answer» गृह-सज्जा के कलात्मक सिद्धान्त (आधार) कला किसी सुन्दर विषय-वस्तु के प्रति मनुष्य की अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इसके उदाहरण हैं–प्रकृति, संगीत, गीत, मूर्ति निर्माण, चित्रकला, सुन्दर-सुन्दर भवनो के निर्माण इत्यादि। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कला का अपना अलग महत्त्व है। कला के निर्माण के चार मुख्य तत्त्व हैं-रेखाएँ, आकार, बनावट की विधियाँ तथा रंग। गृह-सज्जा में कला के इन मूल तत्त्वों के आधार पर कुछ मूलभूत सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। गृह-सज्जा के प्रमुख मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं- ⦁ समानुपात (2) लय-आकृतियों, नापों, रेखाओं तथा रंगों के सम्बन्ध को लय कहते हैं। इसका गति से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। इसमें रेखाओं, आकृतियों व रंगों आदि का प्रयोग बार-बार एक निश्चित क्रम में किया जाता है। घर की सजावट में प्रत्येक स्थान पर लय का होना आवश्यक है। (3) सबलता या क्रम-दृश्य-कला; जैसे—चित्र, मूर्ति, कशीदाकारी, आदि; में कुछ अंश प्रमुख होते हैं। ये आकर्षण बिन्दु होते हैं तथा सबल अंश कहलाते हैं। सबलता का यह सिद्धान्त गृह-सज्जा में भी प्रयुक्त होता है। घर के किसी भी कमरे में खिड़की के परदे, अच्छे चित्र, दरी-कालीन आदि में से कोई भी एक आकर्षण का केन्द्र हो सकता है, परन्तु कमरे की सजावट में आकर्षण बिन्दु एक अथवा . दो से अधिक नहीं होने चाहिए। (4) सन्तुलन--विभिन्न आकारों, डिजाइनों व रंगों इत्यादि के मध्य व्यवस्थित सम्बन्ध सन्तुलन कहलाता है। सन्तुलन दो प्रकार का होता है– (अ) औपचारिक-यह नियमित सन्तुलन होता है। इसमें प्रमुख केन्द्रबिन्दु के दोनों ओर समान भार व समान आकृतियों की वस्तुओं को समान दूरी पर व्यवस्थित किया जाता है। गृह-सज्जा में रंग व्यवस्था का महत्त्व उचित रंग कमरे की शोभा को जहाँ चार-चाँद लगा सकते हैं, वहीं अनुचित रंग उसको भद्दा भी बना सकते हैं। बढ़िया कपड़े का परदा कलात्मक दृष्टि से किसी काम का नहीं यदि उसका रंग कमरे के अनुकूल नहीं बैठता। कभी-कभी साधारण-सी वस्तु से उपयुक्त रंग के कारण कमरे की सज्जा का प्रभाव कहीं अधिक बढ़ जाता है। |
|