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गरम दल के प्रमुख नेताओं ‘लाल-बाल-पाल’ के कार्यों एवं योगदान का मूल्यांकन कीजिए।यालोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर टिप्पणी लिखिए।यालाल-बाल-पाल से आप क्या समझते हैं ? |
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Answer» लाल-बाल-पाल कांग्रेस के तीन प्रमुख नेताओं की एक तिकड़ी थी। ये तीनों नेता कांग्रेस की उग्र या गरम विचारधारा के नेता थे। इनका विचार था कि ब्रिटिश सरकार से स्वराज्य या कोई अन्य सुविधा, उग्रवादी विद्रोह करके ही प्राप्त की जा सकती है। इन्होंने 1907 ई० में कांग्रेस की भिक्षावृत्ति की नीति से असन्तुष्ट होकर कांग्रेस का विभाजन करते हुए उग्रवादी दल का निर्माण किया। लाला लाजपत राय (लाल) पंजाब में सक्रिय थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (बाल) महाराष्ट्र में तथा बिपिनचन्द्र पाल (पाल) बंगाल में सक्रिय थे। इन सभी ने अपने क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभायी। इनका जीवन-परिचय तथा योगदान निम्नलिखित है – 1. लाला लाजपत राय – पंजाब केसरी लाला लाजपत राय स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख कर्णधार थे। इनका जन्म 28 जनवरी, 1865 ई० को पंजाब के फिरोजपुर जिले में हुआ था। आप एक पत्रकार, वकील, शिक्षाशास्त्री, राजनीतिक नेता, समाज-सुधारक तथा सच्चे देशभक्त थे। इन्होंने लोकमान्य तिलक के साथ मिलकर क्रान्तिकारी आन्दोलन का संचालन किया। पंजाब में सामाजिक सुधारों के कार्यों को भी इन्होंने शुरू किया। सन् 1896 ई० में आपने इंग्लैण्ड जाकर वहाँ की जनता को भारतीयों के कष्टों से अवगत कराया। सन् 1905 ई० में इन्होंने कांग्रेस के माध्यम से स्वतन्त्रता आन्दोलन का कार्य शुरू किया था। ये सक्रिय आन्दोलन के कारण कई बार जेल भी गये। सन् 1923 ई० में आप केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्य चुने गये। सन् 1928 ई० के साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में एक जुलूस का नेतृत्व करते समय इन्हें पुलिस की लाठी से घातक चोट लग गयी थी। 17 नवम्बर, 1928 ई० को इनका देहान्त हो गया। 2. बाल गंगाधर तिलक – बाल गंगाधर तिलक भारत के महान् राष्ट्रीय नेता थे। इनका जन्म 23 जुलाई, 1856 ई० को महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ये उग्र विचारधारा के समर्थक थे, इसलिए कांग्रेस में गरम दल के जन्मदाता थे। इनका कहना था कि, ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। और हम उसे लेकर रहेंगे।’ इन्होंने दो समाचार-पत्र ‘मराठा’ और ‘केसरी’ निकाले तथा महाराष्ट्र में ‘शिवाजी उत्सव’ और ‘गणपति उत्सव’ का शुभारम्भ किया। अपने त्याग, तपस्या और देशभक्ति से वे’लोकमान्य’ बन गये। सन् 1893 ई० के अकाल और प्लेग के समय इन्होंने पीड़ितों की बहुत सेवा की। इन्होंने जनता में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की, भिक्षावृत्ति का विरोध किया, भारतीय संस्कृति व जीवन-मूल्यों की पुनः स्थापना की तथा विभिन्न आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया। जन-आन्दोलन चलाने के कारण इन्हें जेल में बन्द कर दिया गया। सन् 1914 ई० में ये जेल से मुक्त होकर बाहर आये। इसके बाद होमरूल आन्दोलन के कर्णधार बन गये। इन्होंने स्वराज्य की महत्ता पर विशेष बल दिया था। तिलक जी 1918 ई० में इंग्लैण्ड भी गये। वहाँ से लौटने के बाद ये अधिकांशतः बीमार रहने लगे और 1 अगस्त, 1920 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया। 3. बिपिनचन्द्र पाल – बिपिनचन्द्र पाल का जन्म 7 नवम्बर, 1858 ई० को हबीगंज (वर्तमान में बांग्लादेश) में हुआ था। इन्होंने राष्ट्र के दलों को इस प्रकार संगठित करने की बात कही जिससे कोई भी शक्ति, जो हमारे मुकाबले में आये, हमारी इच्छा के सामने दबने को मजबूर हो जाए। इनका मानना था कि हमें अंग्रेजी सरकार को पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए। यदि हम सरकार को नौकरी करने वाले आदमी न दें तो हम सरकार की कार्यप्रणाली को असम्भव बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त भी प्रशासन की कार्य-पद्धति को कई तरह से असम्भव बनाया जा सकता है। सन् 1907 ई० में बिपिनचन्द्र पाल ने मद्रास (चेन्नई) प्रान्त का दौरा किया और स्वराज्य का नारा बुलन्द किया। उन्हें 6 महीने जेल में रखा गया था, क्योंकि उन्होंने अरविन्द घोष के विरुद्ध गवाही देने से मना कर दिया था। जेल से रिहा होते ही उन्होंने एक सार्वजनिक सभा की, स्वराज्य का झण्डा फहराया और प्रत्येक विदेशी वस्तु का बहिष्कार करने का निश्चय किया। वास्तव में, बिपिनचन्द्र पाल खुले आम सरकार की सत्ता की अवहेलना करने के पक्षधर थे। वे भारतीयों के मन से ब्रिटिश सरकार का भय निकालकर, उनमें स्वदेशी की भावना का संचार करना चाहते थे। 20 मई, 1932 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया। |
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