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“गुटनिरपेक्ष आन्दोलन द्विध्रुवीय विश्व के समक्ष चुनौती था।” इस कथन को न्यायोचित ठहराइए।

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उक्त कथन को निम्नलिखित बिन्दुओं के द्वारा न्यायोचित ठहराया जा सकता है-

⦁    विश्व की दोनों महाशक्तियाँ नव-स्वतन्त्रता प्राप्त तीसरे विश्व के अल्पमत विकसित देशों को लालच देकर दबाव बनाकर तथा समझौतों का प्रलोभन देकर उनको अपने-अपने गुट में मिलाने हेतु लालायित थे।
⦁    गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापक सदस्यों में एशिया के पं० जवाहरलाल नेहरू तथा सुकर्णो तथा अफ्रीका के वामे एनक्र्मा थे। ये सभी तीसरी दुनिया के प्रतिनिधि देश थे और इन्होंने परतन्त्रता का स्वाद चखा था।
⦁    शीतयुद्ध के दौरान महाशक्तियों द्वारा पश्चिम के अनेक देशों पर हमले किए गए थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को अनवरत चलाए रखना स्वयं में काफी चुनौतीपूर्ण कार्य था। ।
⦁    पाँच सदस्य देशों से अपना सफर शुरू करने वाले गुटनिरपेक्ष देशों ने अपनी सदस्य संख्या 120 कर ली है। इतनी बड़ी संख्या में अपने समर्थक बनाना भी अत्यन्त चुनौतीपूर्ण कार्य है।



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