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हिंदू मूआ राम कहि, मुसलमान ख़ुदाइ।कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकटि न जाइ ।भावार्थ : कबीर निराकार ब्रह्म के उपासक हैं। वे उसकी उपासना की सीख देते हुए कहते हैं कि हिन्दू राम की और मुसलमान खुदा की उपासना करते हुए मर मिटते हैं। जबकि राम और खुदा तो एक ही हैं। अंत में वे कहते हैं कि जो इन दोनों के चक्कर में न पड़कर प्रभु-भक्ति करता है, वही इस संसार में सही अर्थ में जीवन जीता है।1. हिन्दू और मुसलमान प्रभु को किन नामों से पुकारते हैं ?2. कबीर किसके जीवन को सार्थक मानते हैं ?3. साखी में ‘दुहूँ’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया है ?4. प्रस्तुत सारनी की प्रासंगिकता बताइए। |
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Answer» 1. हिन्दू अपने प्रभु को ‘राम’ और मुसलमान ‘खुदा’ के नाम से पुकारते हैं। 2. कबीर उस व्यक्ति के जीवन को सार्थक मानते हैं जो राम-रहीम के चक्कर में नहीं पड़ता है। स्वयं को किसी धर्म-संप्रदाय के बंधन में नहीं बाँधता, बल्कि सच्चे ईश्वर (निराकार ब्रह्म) की उपासना करता है। 3. साखी में ‘दुहूँ’ शब्द राम और खुदा के लिए प्रयोग किया गया है। 4. प्रस्तुत सानी आज भी एकदम प्रासंगिक है। सारा समाज धर्म संप्रदाय में बँटा हुआ है। मनुष्य किसी न किसी संप्रदाय से – जुड़कर धार्मिक कट्टरता का शिकार बन जाता है। |
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