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हम लोग उस कुत्ते के आनंद को देखने लगे। किसी ने उसे राह नहीं दिखाई थी, न उसे यह बताया था कि उसके स्नेह-दाता यहाँ से दो मील दूर हैं और फिर भी वह पहुँच गया। इसी कुत्ते को लक्ष्य करके उन्होंने ‘आरोग्य’ में इस भाव की एक कविता लिखी थी – ‘प्रतिदिन प्रातःकाल यह भक्त कुत्ता स्तब्ध होकर आसन के पास तब तक बैठा रहता है, जब तक अपने हाथों के स्पर्श से मैं इसका संग नहीं स्वीकार करता।इतनी-सी स्वीकृति पाकर ही उसके अंग-अंग में आनंद का प्रवाह बह उठता है। इस वाक्यहीन प्राणिलोक में सिर्फ यही एक जीव अच्छा-बुरा सबको भेदकर संपूर्ण मनुष्य को देख सका है। उस आनंद को देख्न सका है, जिसे प्राण दिया जा सकता है, जिसमें अहैतुक प्रेम ढाल दिया जा सकता है, जिसकी चेतना असीम चैतन्य लोक में राह दिखा सकती है।1. कुत्ता क्यों आनंदित हो उठता था ? इसके लिए वह क्या करता था ?2. स्नेहदाता कौन है ? कुत्ता उनका स्नेह पाने के लिए कहाँ आ पहुँचा ?3. ‘प्रतिदिन’ समास का कौन-सा प्रकार है ? |
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Answer» 1. गुरुदेव का प्यार भरा स्पर्श पाकर कुत्ता आनंदित हो उठता था। यह प्यार भरा स्पर्श पाने के लिए वह कई घण्टों गुरुदेव के। पास बैठा रहता था। 2. स्वयं गुरुदेव कुत्ते के स्नेहदाता हैं। कुत्ता उनका स्नेह पाने के लिए शांतिनिकेतन से श्रीनिकेतन अपने आप आ गया। 3. प्रतिदिन अव्ययीभाव समास है। |
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