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हमारा प्यारा भारतवर्ष पर निबंध लिखिए : |
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Answer» संसार के नक्शे पर बहुत सारे देश विद्यमान हैं। सभी देशों की अपनी – अपनी संस्कृति, सभ्यता, भाषा, प्रकृति और रंग – रूप आदि हैं। उन सबका अपना – अपना महत्त्व भी निश्चय ही है। वहाँ के रहने वाले नागरिकों के मन में अपने – अपने देश के प्रति भक्ति, प्रेम, श्रद्धा और विश्वास सब – कुछ है; लेकिन उन देशों का कई दृष्टियों से वह महत्त्व नहीं, जो मेरे प्यारे देश भारतवर्ष का है। संसार के प्रायः अन्य सभी देशों में एकरूपता है। परन्तु जहाँ तक मेरे देश भारतवर्ष का प्रश्न है, अनेकता और अनेकरूपता को इसकी इतनी महत्त्वपूर्ण विशेषता माना गया है कि उस पर शेष देशों की अलग – अलग सारी विशेषताएँ, सारे रूप न्योछावर किये जा सकते हैं। प्रकृति की गोद में बसे भारत के उत्तर में हिमालय की विशाल और दूर – दूर तक फैली हुई पर्वतमाला है। कश्मीर, मसूरी, शिमला आदि दर्शनीय पहाड़ी स्थल इसी पर्वतमाला की देन है। बाकी तीन दिशाओं में तीन सागर हैं, कि जो कन्याकुमारी में आकर घुल – मिलकर एक हो गए हैं। यहाँ बहने वाली पवित्र नदियों की तो गिनती कर पाना भी संभव नहीं है। इसी प्रकार कहीं पहाड़ी धरती है, तो कहीं कोसों तक रेगिस्तान फैले हुए हैं। इसी प्रकार कहीं दूर – दूर तक खेतों की हरियाली से भरे मैदान हैं, तो कहीं मीलों तक फैले घने जंगल। प्रकृति का इस प्रकार का अनेक रूपों वाला विस्तार संसार के अन्य किसी भी देश में नहीं है। संसार के अन्य देशों में सर्दी – गर्मी आदि में से कोई एक ऋतु ही मुख्य रूप से हमेशा बनी रहती है। ऋतुओं की कुल संख्या भी चार ही मानी गई है, जबकि भारत में बारी – बारी से छः ऋतुएँ आकर अपना ऐश्वर्य दिखाकर और अपना प्रभाव दिखा जाती हैं। वसन्त ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, शरद् ऋतु, शीत ऋतु और शिशिर ऋतु – प्रकृति के इतने रंग – रूप मेरे प्यारे भारत के सिवा और कहीं भी नहीं मिलते! – यों तो मेरे प्यारे देश की भारतीयता नामक एक ही संस्कृति मानी गई है; पर इसकी रचना अन्य कई संस्कृतियों के प्रभावों से हुई है। उन प्रभावों को ग्रहण करके भी अपनापन कभी नहीं गँवाया। भारतीय संस्कृति से ही महानदी से निकलने वाली नहरों के समान बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई उप – संस्कृतियों ने जन्म लिया। इस्लाम और ईसाई संस्कृतियाँ यद्यपि बाहर से आईं, पर अब इनको मानने वाले अपने – आपको भारतीय संस्कृति का अंग मानकर ही इस देश में यहाँ के मूल निवासियों के समान ही सभी प्रकार के अधिकार पाकर अपने – अपने कर्तव्यों का पालन भी कर रहे हैं। इस प्रकार भारत को अनेक धर्मों को जन्म और आश्रय देने वाली भूमि भी माना गया है। वेदों में प्रतिपादित आर्य (हिन्दू) धर्म यहाँ का मूल एवं मुख्य धर्म है। इसकी अनेक शाखाएँ प्रशाखाएँ यहाँ पर अपने – अपने विश्वासों के अनुसार क्रियाशील हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म, पारसी एवं अन्य प्रकार के कई धर्म भी स्वतन्त्र रूप से अपने विश्वासों का पालन करते हुए यहाँ निवास करते रहते हैं। कई प्रकार के धार्मिक – आध्यात्मिक सम्प्रदाय भी इस भारत भूमि पर सद्भाव के साथ, स्वतन्त्रतापूर्वक निवास कर रहे हैं। संसार के अन्य देशों में अपनी मुख्य भाषा भी एक ही स्वीकार की गई है, यों बोलियाँ वहाँ भी कई हैं; पर भारत ने अपने संविधान में बाईस भाषाओं को राष्ट्रभाषा या राष्ट्रीय भाषाओं का ‘नाम और महत्त्व प्रदान कर रखा है। हर भाषा की कई बोलियाँ – उपबोलियाँ आदि भी हैं। भारतभूमि की महानता तीर्थस्थानों, मन्दिरों, ऐतिहासिक किलों तथा अन्य प्रकार के भवनों के कारण भी है। भारत का अतीत अनेक प्रकार के त्याग और बलिदान के इतिहासों से भरा हुआ है। भारत की नीतियाँ भी हमेशा से सबका भला चाहने वाली रही हैं। सबके सुखों और निरोगता की कामना करने वाले वेदों जैसे महान ग्रन्थ, रामायण – महाभारत जैसे महान काव्य इसी देश में रचे गये। चारों कोनों पर स्थापित चार धाम और ज्योतिपिण्ड इसकी सभ्यता – संस्कृति की एकता और महानता को, आत्मिक उच्चता के भावों को प्रकट करने वाले हैं। सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, का उपदेश एवं सन्देश देने वाले अपने प्यारे भारतवर्ष की महानता के सामने मेरा मस्तक अपने – आप ही झुक जाता है। |
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