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हमारे देश में आधुनिक शिक्षा के आरम्भ होने में ईसाई मिशनरियों की क्या भूमिका थी?

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पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप से अनेक व्यापारिक कम्पनियाँ भारत में व्यापार के लिए आने लगी थीं। इनके साथ-ही-साथ यूरोप की अनेक ईसाई मिशनरियों का भी भारत में आगमन होने लगा। इन ईसाई मिशनरियों का भारत आगमन का मुख्यतया उद्देश्य तो ईसाई धर्म का प्रचार एवं प्रसार करना था परन्तु इस मुख्य उद्देश्य की निश्चित एवं शीघ्र प्राप्ति के लिए इन ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा की व्यवस्था को एक प्रबल साधन के रूप में इस्तेमाल करना प्रारम्भ कर दिया। इन ईसाई मिशनरियों ने भारतीय जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करने के लिए तथा अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए देश के विभिन्न भागों में शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।
इन शिक्षण संस्थाओं में सामान्य शिक्षा के साथ-ही-साथ ईसाई धर्म के प्रचार एवं प्रसार का कार्य भी किया जाने लगा। इन शिक्षण संस्थाओं में मिशनरियों द्वारा शिक्षा के पाश्चात्य प्रारूप को अपनाया गया। इस प्रयास से हमारे देश में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात हुआ। इस तथ्य को ही ध्यान में रखते हुए विभिन्न विद्वान ईसाई मिशनरियों को ही भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रवर्तक मानते हैं। स्पष्ट है कि हमारे देश में आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में ईसाई मिशनरियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका तथा उल्लेखनीय योगदान है।



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