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‘हो गई है पीर पर्वत-सी’ गज़ल से पाठकों को क्या संदेश मिलता है?

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हो गई है पीर पर्वत-सी’ गज़ल देशवासियों को जागरण का संदेश देती है। यह प्रगतिवादी विचारधारा से प्रभावित होकर लिखी गई गज़ल है। जब तक देश में शोषित-वर्ग का दुःख दूर नहीं होता तब तक देश प्रगति-पथ पर नहीं जा सकता। दुष्यन्त कुमार दीन-दलितों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं। हर प्रान्त के हर पीड़ित व्यक्ति को शान से जीने का अधिकार है। कवि फिर कहते हैं – मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था आनी चाहिए जहाँ सभी लोग आराम से जिएँ।



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